फतेहपुर – असंगठित कामगार और कर्मचारी कांग्रेस केकेसी के प्रदेश कोऑर्डिनेटर मिस्बाहुल हक़ ने एक बयान में कहा कि लोकतंत्र में मताधिकार ही शासन प्रणाली को विकसित करता है जो उसके संवैधानिक न्याय से मानवाधिकार को संरक्षित करने की प्रक्रिया से जोड़ता है न कि शासन की कृपा से उसे न्याय देना है।
आज की राजनीतिक सोच जिसने सामाजिक जीवन को बदल दिया है वह चिन्ता का विषय के साथ नई पीढ़ी के भविष्य को भी प्रभावित कर रहा है।
हक़ ने कहा है लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी समस्याएं जन्म लेती है क्योंकि राजनीतिक पार्टियों की अलग अलग विचारधारा से संवैधानिक अधिकारों की परिभाषा गढ़ी जाती है लेकिन मूल संकल्पना जो बाबा साहेब डा आंबेडकर जी ने भारतीयों को स्वतंत्रता न्याय समानता भागीदारी पर मौलिक अधिकारों का दिया है वह अगर जन प्रतिनिधियों के हाथों सत्ता का केंद्रीयकरण कर कुछ व्यक्तियों तक एकाधिकार का वर्चस्व वाद से सीमित हो जाता है तो आर्थिक असमानता, जवाब देही का अभाव ,भ्रष्टाचार, प्रशासनिक कार्यवाही में पारदर्शी प्रशासन, नीतियों में कमी और आवश्यकताओं की कमी के साथ प्रतिनिधित्व करने वाले लोग सर्व संप्रभुता का सम्मान नहीं करते हुए दूर हो जाते हैं तब समाज में असंतोष पैदा क्यों होता है यह विचारणीय है।
ऐतिहासिक तथ्य है कि सामाजिक जनांदोलन जनादेश का विरोधी नहीं रहा है लेकिन सत्ता के स्वरूप को जन सरोकार से जोड़ा गया है तब समाज को एक नई दिशा मिली है
जब लोकतांत्रिक सरकारें नहीं रही ब्रिटिश साम्राज्य रहा हो या इसके पूर्व सत्ता का जन सरोकार पर होते अन्याय के खिलाफ एक आवाज गूंजी है। जनता का विरोध कभी हथियार उठा कर नहीं हुआ है। कभी सामूहिक पलायन राजा की सत्ता से असहमत हो कर कर वसूलने वालों से तंग आकर या लुटेरों से परेशान होकर गांव छोड़कर चले जाते थे क्योंकि किसान समाज अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार थी। कबीर ने सामाजिक भेदभाव पर, गुरुनानक जी ने मानव समानता , गोकुला और सत् नामियों ने सत्ता के खिलाफ , राजाराम मोहन राय ने सती प्रथा, ज्योतिबा फुले ने शिक्षा और जातिगत समानता की लड़ाई लड़ी डॉ आंबेडकर जी ने अस्पृश्यता और मानवाधिकार पर महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य से देश को अलग करने, किसान ,श्रम और साम्प्रदायिक सद्भावना बनाए रखने में ज़मीनी आवाज़ मुखर की और प्रतिभाग किया।
केवल विदेशी आक्रांत ही हथियार उठाकर सत्ता के लिए विदूषक के सहयोग से राजा के विरुद्ध किया है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संभव ही नहीं होगा।
केन्द्र की सत्ता स्थापित लोकतांत्रिक देश में जिस संवैधानिक व्यवस्था के साथ आई है उसी व्यवस्था से अगर जनता के विश्वास पर खरी नहीं उतर पा रही तो वोट की ताकत से कितनी ही सशक्त सत्ता हो बदल ही जाती है ।
इसलिए चलो दिल्ली का नारा जनादेश के खिलाफ नहीं वोट सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु एक हस्तक्षेप है जिसे केंद्रीय चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से विश्वसनीयता पर सवाल उठा है जिसे जननायक राहुल गांधी जी के साथ तमाम राजनीतिक सामाजिक संगठन गांधी वादी अहिंसात्मक ढंग से उठा रहे हैं।
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चलो दिल्ली जनादेश के विरुद्ध नहीं वोट सुरक्षा हेतु लोकतांत्रिक जवाबदेही का अहिंसात्मक हस्तक्षेप है – मिस्बाहुल हक़
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