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मथुरा–वृंदावन में गेस्ट हाउसों की बाढ़: किसकी शह पर मिल रही मंजूरी, हादसे के बाद ही क्यों जागता है प्रशासन?

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संवाददाता आलोक तिवारी

मथुरा–वृंदावन में बीते कुछ वर्षों में संकरी गलियों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में 80–100 गज के छोटे प्लॉटों पर तीन से चार मंजिला होटल, लॉज और गेस्ट हाउस धड़ल्ले से खड़े हो गए हैं। सवाल यह है कि आखिर किसकी शह पर इन निर्माणों को अनुमति दी जा रही है, या फिर नियमों की खुली अनदेखी कर यह पूरा खेल चल रहा है? हालिया घटना के बाद प्रशासन की सक्रियता केवल एक होटल तक सीमित दिख रही है, जबकि ऐसे अनगिनत निर्माण शहर भर में मौजूद हैं जहाँ आग लगने या किसी अनहोनी की स्थिति में फायर ब्रिगेड का पहुंचना भी संभव नहीं है।
तंग गलियों में बने इन बहुमंजिला गेस्ट हाउसों में न पर्याप्त पार्किंग है, न फायर सेफ्टी के मानकों का पालन, न ही आपातकालीन निकास की समुचित व्यवस्था। पर्यटन नगरी होने के कारण यहाँ प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु और पर्यटक ठहरते हैं, ऐसे में सुरक्षा मानकों की अनदेखी सीधे तौर पर जनजीवन से खिलवाड़ है। इसके बावजूद संबंधित विभागों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि बिना नक्शा स्वीकृति, बिना अग्निशमन एनओसी और बिना मानक दूरी के आखिर निर्माण कैसे खड़े हो गए?
कई सामाजिक संस्थाओं ने प्रदेश सरकार से हस्तक्षेप कर व्यापक जांच और कठोर कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि एक होटल पर कार्रवाई हो सकती है तो समान परिस्थितियों में बने अन्य होटल और लॉजों पर भी समान रूप से जांच होनी चाहिए। चयनात्मक कार्रवाई से यह संदेश जा रहा है कि प्रशासन केवल औपचारिकता निभा रहा है।
पंडित संजय पाराशर ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े करते हुए कहा कि “प्रशासन हर बार घटना के बाद नींद से जागता है। यदि समय रहते अवैध और असुरक्षित निर्माणों पर रोक लगा दी जाती तो आज ऐसी घटनाओं की नौबत ही नहीं आती। क्या संबंधित अधिकारियों को इन तंग गलियों में खड़े चार-चार मंजिला भवन दिखाई नहीं देते? यदि दिखाई देते हैं तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं होती? और यदि नहीं दिखाई देते तो यह प्रशासनिक विफलता है।”
उन्होंने आगे कहा कि “मथुरा–वृंदावन आस्था का केंद्र है, लेकिन यहाँ सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। जिन अधिकारियों के कार्यकाल में यह अव्यवस्थित निर्माण हुए हैं, उनकी भूमिका की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। केवल एक होटल को सील कर देने से जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। जब तक पूरे शहर में सर्वे कर नियमों का उल्लंघन करने वालों पर समान और कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह कार्रवाई लीपापोती ही मानी जाएगी।”
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रदेश सरकार इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान लेकर व्यापक जांच कराएगी या फिर कार्रवाई एक-दो मामलों तक सीमित रह जाएगी? मथुरा–वृंदावन जैसे संवेदनशील धार्मिक और पर्यटन नगर में सुरक्षा मानकों से समझौता किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। प्रशासन को यह तय करना होगा कि वह हादसों के बाद सक्रिय होगा या पहले से सतर्क रहकर जनसुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

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