हमारा देश युगों से कृषि प्रधान देश रहा है ।इसलिए यहां के सारे पर्व कृषि से ही संबंध रखते हैं। दीवाली आते-आते खेतों से धान की उपज कटकर घर आ जाती है। स्वाभाविक है सभी के भीतर प्रसन्नता, उत्साह एवं आनंद की अपरिमित अनुभूति हो। इसी अनुभूति को व्यक्त करने का यह पंच पर्वी त्यौहार एक माध्यम है। इसके अंतर्गत धान्य त्रयोदशी (धन्वंतरि जन्म दिवस), नर्क चतुर्दशी, दीवाली, अन्नकूट एवं भैया दूज के पर्व सम्मिलित हैं। धन त्रयोदशी या धनतेरस मां लक्ष्मी और धन्वंतरि के उद्भव से संबंधित एवं समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से संबंध रखती है। इसी दिन पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन से देव वैद्य धन्वंतरि तथा माता लक्ष्मी का उद्भव हुआ था। नरक चतुर्दशी श्री कृष्ण के द्वारा नरकासुर के संहार से संबंधित है। इसका संपूर्ण नाम नर्क निवारण चतुर्दशी है। इसी दिन हनुमान जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। दीवाली भगवती लक्ष्मी की पूजा एवं भगवान राम के अयोध्या आगमन तथा उनके अयोध्या वासियों के स्वागत से संबंधित है। बहुत पहले तक लक्ष्मी और गणेश के साथ कुबेर की पूजा नहीं जुड़ी हुई थी। कुबेर यक्षों के अधिपति तथा धनाध्यक्ष के रूप में प्रतिष्ठित है ।इन्हें माता लक्ष्मी की पूजा के साथ बाद में सम्मिलित किया गया है । यह भगवान शंकर के सखा तथा कैलाश पर्वत के रक्षक के रूप में भी सम्मानित हैं ।अन्नकूट पर्व भगवान कृष्ण के द्वारा की गई गोवर्धन पूजा से संबंधित पर्व है तथा भैया दूज वैदिक काल की यम तथा यमी की कथा से संबंध रखताहै ।जो सूर्यपुत्र यमराज तथा सूर्यपुत्री यमुना का स्मरण कराता है । इसी दिन धर्मराज यमराज अपनी बहन यमुना के यहां भाई बहन से संबंधित पर्व मनाने के लिए गए थे। तभी से यह कथा प्रसिद्ध है कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के यहां जाता है और उसे समुचित उपहारों से संतुष्ट करता है ।उसे कभी यम दंड का भागी नहीं होना पड़ता। इसी दिन चित्रगुप्त पूजा का भी विधान है।
दीपावली के दिन से ही वैश्य परिवार अपने नए खाते का पूजन कर उसका शुभारंभ करते हैं। दीपमालाओं से सजा हुआ यह पांच दिवसीय पर्व अत्यंत ही मनमोहक है । पहले तो मिट्टी के दीपकों से ही इस त्यौहार में अपने भवनों को सजाया जाता था लेकिन अब बिजली की झालरों की जगमगाती चकाचौंध आंखों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेती है । विभिन्न प्रकार के पटाखों की गर्जना और सतरंगी रोशनियों से नहाए हुए भवन और गलियां अत्यंत मोहक प्रतीत होती हैं।
हिंदी एवं संस्कृत साहित्य में इस पर्व का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया गया है। एक स्थान पर आया है- विप्राणाम् श्रावणी पूर्णिमा, क्षत्रियाणाम् विजयादशमी।
वैश्याणाम् दीपावली, शूद्राणाम् च होलिकोत्सव:।।
लेकिन वर्तमान में ऐसा कुछ भी नहीं है अब सारे त्यौहार सभी लोग मिलजुल कर मनाते हैं और सभी त्योहारों का सभी लोग आनंद उठाते हैं।
हिंदी साहित्य में जगन्नाथ प्रसाद ‘रत्नाकर’ जी विरहिणी व्रजांगनाओं का विरह उत्ताप व्यक्त करते हुए दीपावली पर कहते हैं- “आवत दीवारी ब्रजबारी बिलखाइ कहैं,
वैसियै पुरंदर कृपा जो लहि जाएगी।
नातरु हमारी सारी बिरह – बलाय संग
सारी ब्रह्म ज्ञानता तिहारी बहि जाएगी।।”
आधुनिक मीरा के नाम से सु्ख्यात महादेवी जी ने दीपक को प्रतीक बनाकर अनेकानेक कविताएं प्रस्तुत की हैं । उनका कहना है “मधुर -मधुर मेरे दीपक जल ।”
” दीप मेरे जल अकंपित, घुल अचंचल ।
भीति क्या, नभ है व्यथा का आंसुओं से सिक्त अंचल।।”
“सब बुझे दीपक जला लूं।”
घिर रहा तम,आज दीपक रागिनी अपनी जगा लूं ।।
“जब यह दीप थके तब आना ।
दे सौरभ से पंख इन्हें सब नैनों में पहुंचाना।”
“यह मंदिर का दीप, इसे नीरव जलने दो।
इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो।।”
वहीं गोपाल दास ‘नीरज’ गाते हैं-“जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना, धरा पर अंधेरा कहीं रह न जाए।”
इस दीपावली के अवसर पर सभी को मंगल कामनाएं प्रस्तुत करता हुआ मेरा भी कथन है- एक ऐसा दिया भी जले विश्व में, जो सभी के दिलों में उजाला करे।
दुष्टता- धूर्तता का तिमिर मेटकर, राह में जिंदगी को संभाला करे।।






