इस वर्ष 27 मार्च 2026 को रामनवमी का पावन पर्व मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन त्रेता युग में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। ज्योतिषीय दृष्टि से भगवान श्रीराम का जन्म वसंत ऋतु, पुनर्वसु नक्षत्र, अभिजीत मुहूर्त, चैत्र शुक्ल नवमी और मंगलवार के दिन मध्याह्न काल में हुआ माना जाता है।

ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर विद्वानों का मानना है कि वसंत ऋतु में जन्म लेने के कारण जातक स्वभाव से प्रसन्नचित्त, उत्सवप्रिय और मानसिक रूप से आनंदित होता है। पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति में आध्यात्मिकता, धर्म के प्रति आस्था तथा अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने का स्वभाव होता है। इस नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी अदिति मानी जाती हैं, इसलिए ऐसे जातक में देवत्व के गुणों की संभावना अधिक रहती है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में हुआ माना जाता है, जिसके आधार पर नाम का पहला अक्षर ‘हि’ माना गया है। इस आधार पर हिरण्यकेतु, हिरण्यगर्भ या हिरण्य जैसे नाम संभावित बताए जाते हैं।
मंगलवार का दिन और मध्याह्न काल भी तेज, ओज और पराक्रम को बढ़ाने वाला माना गया है। जन्म कुंडली में कर्क लग्न में चंद्रमा और गुरु की युति होने से उच्च शिक्षा, बुद्धिमत्ता और मानसिक शीतलता के योग बनते हैं। इसी कारण भगवान श्रीराम ने अल्पायु में ही सभी विद्याओं में पारंगतता प्राप्त की और उनके लिए राजतिलक का भी योग बना, लेकिन शनि के प्रभाव से वह खंडित हो गया।
तुला राशि में स्थित शनि के कारण जीवन में पारिवारिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यही कारण रहा कि उन्हें पिता से वियोग और वनवास जैसी कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। कई बार लोकापवाद और संघर्ष की स्थितियां भी सामने आईं।
मकर राशि में स्थित मंगल के कारण सभा और युद्ध में विजय के प्रबल योग बने। इसी कारण जनकपुर में स्वयंवर के दौरान शिवधनुष भंग करना और बाद में रावण का वध संभव हुआ। चार प्रमुख ग्रहों के उच्च स्थान में होने के कारण भगवान श्रीराम को अवतारी पुरुष, यशस्वी और चक्रवर्ती सम्राट के रूप में माना जाता है।
सूर्य का मेष राशि में होना उन्हें प्रतापी और तेजस्वी बनाता है, जबकि मीन राशि में शुक्र और केतु की युति के कारण जीवन में कई बार परिस्थितियां बनते-बनते बिगड़ती रहीं। पत्नी से गहरा प्रेम होने के बावजूद अलगाव की स्थितियां बनीं, जिसका उदाहरण सीता हरण और बाद में उनका द्वितीय वनवास माना जाता है।
वृष राशि में बुध की स्थिति के कारण जीवन में लंबी यात्राओं के योग भी बने। इसी कारण बचपन में विश्वामित्र के साथ मिथिला की यात्रा और वनवास के दौरान लंका तक का अभियान उनके जीवन का हिस्सा बना।
लेख के अंत में यही निष्कर्ष निकलता है कि जीवन में सुख और दुख दोनों ही कर्म और संयोग के आधार पर आते हैं—
“जो भी जन्मा जगत में, बना यही संयोग।
सुख-दुख दोनों ही मिले, पड़ा भोगना भोग।। ”







