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होलिकोत्सव : परंपरा और वर्तमान

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लेखक : शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी

रंग, उल्लास और सामाजिक समरसता का पर्व होली इस वर्ष 3 मार्च से 5 मार्च तक विविध स्वरूपों में मनाया जाएगा। 3 मार्च को होलिका दहन, 4 मार्च को रंग पर्व तथा 5 मार्च को भैया दूज के साथ उत्सव का समापन होगा।

3 मार्च को चैतन्य महाप्रभु की जयंती भी है। 4 मार्च को संत तुकाराम जयंती, गणगौर व्रत का आरंभ, आधुनिक मीरा कही जाने वाली महादेवी वर्मा की जन्म जयंती तथा पंजाब का प्रसिद्ध होला मेला मनाया जाएगा। 5 मार्च को भैया दूज के साथ-साथ राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का जन्मदिन भी है।

पौराणिक और वैदिक संदर्भ

होलिकोत्सव की सर्वाधिक प्रचलित कथा हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद और होलिका से जुड़ी है, जो सत्य और भक्ति की विजय का प्रतीक है। किंतु प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख ‘मदनोत्सव’ के रूप में भी मिलता है। यह उत्सव चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को सामूहिक रूप से रंग पर्व के रूप में मनाया जाता था।

इसका विस्तारपूर्वक वर्णन हजारी प्रसाद द्विवेदी की कृति बाणभट्ट की आत्मकथा, सम्राट हर्षवर्धन के नाटकों तथा बाणभट्ट रचित हर्ष चरितम् में मिलता है। वैदिक काल में यह ‘मदन महोत्सव’ के रूप में चैत्र शुक्ल द्वादशी से चतुर्दशी तक मनाया जाता था।

इस अवसर पर महिलाएं व्रत रखकर वनों में अशोक वृक्ष के नीचे कामदेव की पूजा करती थीं। सामूहिक गीत, वादन, नृत्य और रात्रि जागरण का आयोजन होता था। कुमारिकाएं सुयोग्य पति की कामना से इसमें भाग लेती थीं। गंधर्व शब्द ‘कंदर्प’ (कामदेव) का ही रूपांतरण माना गया है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास अनामदास का पोथा में भी इस उत्सव का विस्तृत उल्लेख है। इसके संकेत ऋग्वेद, कालिदास के नाटक विक्रमोर्वशीयम् तथा रामधारी सिंह दिनकर की कृति उर्वशी में भी प्राप्त होते हैं।

सामाजिक परिवर्तन और विकृतियाँ

समय के साथ यह उत्सव तरुण-तरुणियों के सामूहिक मिलन पर्व में परिवर्तित हुआ, जो आज भी कुछ आदिवासी समुदायों में प्रचलित है। किंतु जब रंग-गुलाल की मर्यादा लांघकर कीचड़, मल तथा मद्यपान से जुड़ी उद्दंडता बढ़ी और नारी गरिमा पर आघात होने लगा, तब समाज और शासन को इस पर नियंत्रण के लिए बाध्य होना पड़ा।

इतिहास साक्षी है कि जो पर्व कभी प्रेम, सौहार्द और प्रकृति के उत्सव का प्रतीक था, वही अनुशासनहीनता के कारण आलोचना का विषय भी बना। अतः आवश्यकता है कि हम इसकी मूल भावना को समझें और उसे पुनर्जीवित करें।

प्रेम और मर्यादा का संदेश

“होली ऐसी खेलिए, चढ़े प्रेम का रंग।
सब में हर्षोल्लास हो, पर्व न हो बदरंग।।”

होलिकोत्सव का वास्तविक उद्देश्य समाज में प्रेम, समरसता और आनंद का संचार करना है। यदि हम इसकी ऐतिहासिक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को आत्मसात करें, तो यह पर्व न केवल रंगों का, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का भी उत्सव बन सकता है।

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