सिखों के नवें गुरु , गुरु तेग बहादुर (जन्म 1 अप्रैल 1621) छठे गुरु हरगोविंद सिंह जी के सबसे छोटे बेटे थे। 25 मई 1675 को पंडित कृपाराम की अगुवाई में हिंदुओं के एक विशाल जत्थे ने उनसे अपनी रक्षा की गुहार लगाई- “कश्मीर का राज्यपाल इफ्तेखार खां हमें बलात् इस्लाम धर्म कबूल करवा रहा , हम सबके सर कलम कर दिए जाएंगे।” उन्होंने कहा कि उससे कह दो “तेग बहादुर इस्लाम कबूल करेगा, तभी हम अपना धर्म बदलेंगे, वरना नहीं।”
11 जुलाई 1675 को अपने बाद अपने नौ वर्षीय बेटे गोविंद राय को दशवें गुरु की गद्दी पर बैठाने की घोषणा कर पांच अनुयायियों – मती दास, सती दास, दयाला,जैता और उदय के साथ दिल्ली को रवाना हो गए लेकिन दूसरे दिन ही रोपड़ थाने के हाकिम मिर्जा नूर मोहम्मद के हाथों गिरफ्तार कर दिल्ली के चांदनी चौक के थाने में भेज दिये गये और इस्लाम धर्म कबूल न करने पर उन्हीं के सामने मती दास को आरे से काट डाला गया, सती दास को खौलते तेल के कड़ाह में डालकर भून दिया गया तथा दयाला को रुई में लपेटकर खंभे में बांध जिंदा ही जला दिया गया । उनका भी 24 नवंबर 1675 को जल्लाद जलालुद्दीन के हाथों सिर धड़ से अलग कर दिया गया।
दिल्ली का बंगला साहिब गुरुद्वारा जहां वे ठहरे थे, शीशगंज गुरुद्वारा जहां उनका सिर धड़ से अलग से किया गया , रकाबगंज गुरुद्वारा जहां पर उनकी अंत्येष्टि हुई तथा पटना के आनंदपुर साहिब का शीशगंज गुरुद्वारा जहां उनका सिर दफनाया गया था, निर्मित हैं। उन मानवता के महान संपोषक को साश्रु शत – शत नमन।
“जब तक यह धरती गगन, जब तक हिन्दुस्तान।
कौन भूल सकता भला,उन गुरु का वलिदान।।”
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24 नवंबर 2025 – गुरु तेग बहादुर वलिदान दिवसलेखक : शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी
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