लेखक: शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी
19 मार्च 2026 को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ हिंदू नववर्ष का शुभारंभ होगा। इस दिन से विक्रम संवत 2083 की शुरुआत मानी जाएगी। सनातन परंपरा में यह तिथि नववर्ष के रूप में विशेष महत्व रखती है। इस वर्ष अमावस्या के साथ ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का प्रारंभ होने से इसी दिन से नए संवत का आरंभ माना जाएगा।
पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार विक्रम संवत का संबंध उज्जयिनी के महान सम्राट विक्रमादित्य से माना जाता है। प्राचीन परंपरा के अनुसार उज्जयिनी के महाराज गंधर्व सेन के दो पुत्र थे—ज्येष्ठ पुत्र भर्तृहरि और कनिष्ठ पुत्र विक्रमादित्य। कहा जाता है कि अपनी प्रिय रानी पिंगला से क्षुब्ध होकर भर्तृहरि ने राजपाट त्याग दिया और गुरु गोरखनाथ के शिष्य बनकर वन में तपस्या के लिए चले गए। इसके बाद उनके छोटे भाई विक्रमादित्य ने राज्य की बागडोर संभाली। उनके न्यायप्रिय और आदर्श शासन की अनेक कथाएं आज भी प्रचलित हैं। उनके राज्यारोहण की तिथि से ही विक्रम संवत का प्रचलन प्रारंभ हुआ।
एक अन्य ऐतिहासिक मत के अनुसार उज्जयिनी के राजकुमार विषमशील ने अपने संरक्षक विक्रम मित्र और पिता महेंद्रादित्य के नाम को मिलाकर ‘विक्रमादित्य’ नाम धारण किया और उसी समय से विक्रम संवत का आरंभ हुआ। इससे पहले भारत में युधिष्ठिर संवत का प्रचलन था। बाद में ‘विक्रमादित्य’ नाम उपाधि के रूप में प्रसिद्ध हो गया और कई राजाओं ने इसे धारण किया, जिनमें चाणक्य के शिष्य महाराज चंद्रगुप्त का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
धार्मिक मान्यता है कि इसी तिथि से सृष्टि की रचना का आरंभ परमपिता ब्रह्मा द्वारा किया गया था। इसी दिन मत्स्यावतार, झूलेलाल जयंती और दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला उगादि पर्व भी पड़ता है। साथ ही वासंतिक नवरात्र का शुभारंभ भी इसी तिथि से माना जाता है।
इस प्रकार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सनातन संस्कृति में अत्यंत पवित्र और मंगलमय तिथि मानी जाती है, जो नव ऊर्जा, नई शुरुआत और आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है।
मंगलकामना:
मंगलमय नव वर्ष हो, बढ़े हर्ष-उत्कर्ष।
दुख-दरिद्रता दूर हों, मिटें शोक-संघर्ष।।








