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ओमप्रकाश राजभर को बड़ा झटका, मुकेश साहनी की पार्टी में शामिल हुए यूपी अध्यक्ष

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लखनऊ : उत्तर प्रदेश की जातीय और गठबंधन की राजनीति में एक और बड़ा सियासी भूचाल आया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के प्रदेश अध्यक्ष प्रेम चंद्र कश्यप ने पार्टी छोड़कर बिहार के पूर्व मंत्री मुकेश साहनी की अगुवाई वाली विकसशील इंसान पार्टी (वीआईपी) का दामन थाम लिया है। इस घटनाक्रम को ओमप्रकाश राजभर के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि कश्यप SBSP में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं।

इसी मौके पर पूर्व मंत्री अच्छे लाल निषाद ने भी वीआईपी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। अच्छे लाल निषाद जन अधिकारी पार्टी से जुड़े रहे हैं। दोनों नेताओं के आने से मुकेश साहनी की पार्टी को उत्तर प्रदेश में नई ताकत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, खासकर निषाद, कश्यप और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए।

सपा के बाद राजभर ने थामा था भाजपा का दामन

ओमप्रकाश राजभर, SBSP के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख चेहरे हैं। राजभर समुदाय के साथ-साथ व्यापक पिछड़े वर्ग की राजनीति में उनकी पकड़ मानी जाती है। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर में कई बार गठबंधन बदले हैं। 2017 में उन्होंने BSP के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, फिर 2019-2022 के आसपास सपा गठबंधन में रहे, लेकिन बाद में भाजपा के साथ आकर योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।

राजभर अक्सर गठबंधन की राजनीति में उतार-चढ़ाव देखते रहे हैं। 2024-25 में बिहार चुनावों को लेकर भी SBSP और भाजपा के बीच सीट बंटवारे पर तनाव देखा गया था, जहां राजभर ने NDA से 4-5 सीटों की मांग की थी। ऐसे में पार्टी के अंदरूनी कलह और असंतोष की खबरें पहले से ही चर्चा में थीं। प्रेम चंद्र कश्यप का वीआईपी में जाना इसी असंतोष का नतीजा माना जा रहा है।

मुकेश साहनी को कहा जाता है ‘सन ऑफ मल्लाह’

मुकेश साहनी, जिन्हें ‘सन ऑफ मल्लाह’ कहा जाता है, बिहार में अतिपिछड़ों और मछुआ समुदाय की आवाज बनकर उभरे हैं। वीआईपी पार्टी को अब यूपी में विस्तार देने की रणनीति के तहत ये शामिलियां महत्वपूर्ण हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए छोटी-छोटी जातीय पार्टियां अपनी ताकत बढ़ाने और बड़े दलों के साथ संभावित गठबंधन के लिए पोजीशनिंग कर रही हैं।

इस घटनाक्रम से SBSP में बेचैनी बढ़ सकती है, जबकि वीआईपी को यूपी में अपनी उपस्थिति मजबूत करने का मौका मिला है। ओमप्रकाश राजभर की प्रतिक्रिया का इंतजार है, क्योंकि उनके करीबी नेता के जाने से पार्टी की संगठनात्मक मजबूती पर सवाल उठ सकते हैं।

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