शहर में नगर पालिका परिषद द्वारा 15वें वित्त आयोग अनुदान के तहत कराए गए वाटर कूलर स्थापना कार्य अब सवालों के घेरे में आ गए हैं। उपलब्ध टेंडर दस्तावेजों, तकनीकी डेटा और स्थानीय स्तर पर सामने आ रही शिकायतों के आधार पर इन कार्यों में गंभीर तकनीकी एवं वित्तीय अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है। मामला सार्वजनिक धन के उपयोग, कार्यों की पारदर्शिता और सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता से जुड़ा होने के कारण स्वतंत्र जांच की मांग तेज हो रही है।
वर्ष 2020-21 में चार स्थानों पर लगाए गए थे वाटर कूलर
नगर पालिका परिषद द्वारा वर्ष 2020-21 में शहर के चार प्रमुख स्थानों पर वाटर कूलर लगाए जाने की जानकारी दी गई थी। इनमें राधानगर पुलिस चौकी के पास, जिला अस्पताल के सामने, कलेक्ट्रेट परिसर तथा ताम्बेश्वर चौराहा शामिल थे।
इसके बाद 31 जनवरी 2025 को “शहरी क्षेत्र के 10 विभिन्न चौराहों पर वाटर कूलर स्थापना कार्य” के लिए लगभग 43.39 लाख रुपये का नया टेंडर जारी किया गया। टेंडर के तकनीकी दस्तावेजों का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह केवल सामान्य वाटर कूलर लगाने का कार्य नहीं था, बल्कि प्रत्येक स्थल पर स्वतंत्र जल स्रोत आधारित पूरी प्रणाली प्रस्तावित थी।
टेंडर में शामिल थे बोरिंग से लेकर सबमर्सिबल तक के कार्य
टेंडर तकनीकी डेटा में बोरिंग मशीन स्थापना, 125 एमएम पीवीसी पाइप, स्लॉटेड पाइप, फ्लेक्सिबल कॉलम पाइप, 1 एचपी सबमर्सिबल मोटर पंप, बोर डेवलपमेंट, 100 PSI कम्प्रेसर वॉशिंग, पी ग्रेवल भराई, 1000 लीटर सिंटेक्स टंकी, आरसीसी निर्माण, स्लैब, प्लिंथ बीम, इलेक्ट्रिफिकेशन कार्य तथा एमएस फ्रेमवर्क एवं साइन बोर्ड जैसे कार्य स्पष्ट रूप से शामिल बताए गए हैं।
तकनीकी दृष्टि से यह व्यवस्था प्रत्येक वाटर कूलर के लिए अलग बोरिंग और सबमर्सिबल पंप आधारित जल स्रोत को दर्शाती है। यानी केवल नगर जलापूर्ति पाइप लाइन से कनेक्शन देकर काम पूरा करने की परिकल्पना नहीं थी।
स्थानीय स्तर पर उठ रहे गंभीर सवाल
स्थानीय नागरिकों और सूत्रों के अनुसार कई स्थानों पर वास्तविक बोरिंग दिखाई नहीं देती। कई वाटर कूलरों पर सबमर्सिबल पंप मौजूद नहीं हैं, जबकि कुछ वाटर कूलर लंबे समय से बंद पड़े हैं या केवल शोपीस की तरह लगे दिखाई देते हैं। कुछ स्थानों पर नगर जलापूर्ति पाइप लाइन से अस्थायी कनेक्शन के जरिए पानी चलाने की बात भी कही जा रही है।
इसके अलावा हर वर्ष “अस्थायी प्याऊ” के नाम पर अलग से खर्च दर्शाए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि स्थायी वाटर कूलर व्यवस्था स्थापित की जा चुकी है तो फिर अस्थायी प्याऊ पर लगातार खर्च क्यों हो रहा है।
10 चौराहों की लोकेशन आज तक सार्वजनिक नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि 2025 के टेंडर में जिन “10 विभिन्न चौराहों” का उल्लेख किया गया था, उनकी पूरी सूची आज तक सार्वजनिक नहीं की गई। जबकि हाल ही में जारी नए टेंडर में छह स्थानों का स्पष्ट उल्लेख सामने आया है, जिनमें बाकरगंज चौराहा, पत्थरकटा चौराहा, लाला बाजार, सादीपुर रेलवे स्टेशन के पीछे, गाजीपुर बस स्टाप और नई तहसील के पास के क्षेत्र शामिल हैं।
इसी बीच वित्तीय वर्ष 2026-27 में जलकल अनुभाग द्वारा 16 अप्रैल 2026 को नई ई-निविदा सूचना भी जारी कर दी गई। लगातार नए टेंडर जारी होने के बावजूद पूर्व में लगाए गए वाटर कूलरों की वास्तविक स्थिति, उनकी लोकेशन और कार्यशीलता को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
जांच में उठ सकते हैं कई महत्वपूर्ण प्रश्न
मामले की निष्पक्ष जांच होने पर कई अहम बिंदुओं की पुष्टि आवश्यक होगी। इनमें यह जांच शामिल हो सकती है कि क्या सभी 10 स्थानों पर वास्तविक बोरिंग कार्य हुआ, क्या सबमर्सिबल पंप खरीदे और स्थापित किए गए, क्या भूजल उपयोग की अनुमति ली गई, क्या विद्युत कनेक्शन जारी और चालू किए गए तथा क्या भुगतान वास्तविक भौतिक सत्यापन के बाद किया गया।
इसके अलावा Measurement Book (MB), कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र, साइट सत्यापन रिपोर्ट, जियो टैग फोटो, GPS निरीक्षण रिकॉर्ड, बोरिंग गहराई रिपोर्ट, बिल वाउचर और सप्लायर-ठेकेदार से जुड़े दस्तावेज भी जांच के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।
सार्वजनिक धन के उपयोग पर बड़ा सवाल
यदि बिना वास्तविक कार्य के भुगतान हुआ है या दस्तावेजों और जमीनी स्थिति में अंतर पाया जाता है, तो मामला सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितता और सरकारी अभिलेखों में भ्रामक विवरण दर्ज किए जाने से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है। ऐसे मामलों में विभागीय जांच, तकनीकी ऑडिट, वित्तीय ऑडिट और सतर्कता जांच की मांग उठ सकती है।
अब यह मामला केवल वाटर कूलर स्थापना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि नगर पालिका के कार्यों की पारदर्शिता, जवाबदेही और सरकारी धन के वास्तविक उपयोग पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि सभी वाटर कूलर स्थलों की सूची सार्वजनिक की जाए और उनकी स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए।






