
इस बार 4 सितंबर 2026 दिन शुक्रवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व है । अष्टमी 4 सितंबर दिन शुक्रवार को अपराह्न 2:25 से लेकर 5 सितंबर दिन शनिवार को 12:13 तक है। भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का शुभ मुहूर्त 4 सितंबर की रात्रि 11:57 से 12:45 तक है ।
भगवान श्री कृष्ण का जन्म 27 जुलाई 3112 ईसा पूर्व भाद्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी , दिन बुधवार ,मध्य रात्रि, रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। उनका समस्त जीवन मथुरा, गोकुल, बरसाना, नंदगांव, वृंदावन तथा हस्तिनापुर ,द्वारिका इत्यादि में बीता। लगभग 89 वर्ष की अवस्था में उन्होंने महाभारत जैसे महान युद्ध में अर्जुन के सारथी बनकर पांडवों का सहयोग किया और उसके बाद 36 वर्षों तक द्वारिका में राज्य करने के पश्चात 125 वर्ष की अवस्था में प्रभास तीर्थ ( गुजरात के सोमनाथ मंदिर के आसपास ) में देह परित्याग किया।
भगवान कृष्ण के व्यक्तित्व पर गंभीरता से विचार करने पर परिलक्षित होता है कि इसमें संस्कृत से लेकर हिंदी तक के विभिन्न साहित्यकारों का बहुत बड़ा योगदान है। श्रीमद्भागवत जो उनकी बाल लीलाओं और गोपी प्रसंग इत्यादि का मूलाधार है ‘गीत गोविंद’ के रचयिता जयदेव के भ्राता बोबदेव के द्वारा रचित और व्यास जी के नाम से प्रचारित है जो ‘हिमाद्रि’ नामक ग्रंथ से प्रमाणित है-“श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं च मयेरितम्।
विदुषा बोबदेवेन श्री कृष्णस्य यशोन्वितम्।।” यही आगे चलकर सगुण कृष्ण भक्ति शाखा के भक्ति कालीन एवं रीतिकालीन कवियों के वात्सल्य और श्रृंगार रस की महत्वपूर्ण आधारशिला बना जो अद्यावधि गतिमान है। पंच साहस्री से शत साहस्री संहिता में परिणत महाभारत नामक ग्रंथ में श्रीमद्भगवद्गीता बहुत बाद में प्रचेता द्वारा प्रविष्ट की गई।
महान संत कवि सूरदास, रसखान ,रहीम तथा अष्टछाप के कवियों द्वारा उनकी बाल लीलाओं और गोपी प्रसंग को अत्यंत मोहक, सजीव और अतिरंजना पूर्ण प्रस्तुत किया गया। नौ वर्ष की अवस्था के पूर्व ही वह गोकुल छोड़कर मथुरा आ गए थे। उस समय राधा की आयु 17 वर्ष से अधिक थी । गोपिकाओं के पति ही नहीं उनके बच्चे भी श्री कृष्ण के साथ खेलते- कूदते थे। फिर भी जिस प्रकार का श्रृंगारिक आवरण उस अवस्था में उन पर डाला गया और आगे चलकर इतना अमर्यादित और कामुकतापूर्ण हो गया, सर्वथा अनुचित है।
श्री कृष्ण भगवान विष्णु के सोलह कलाओं से संयुक्त आठवें अवतार के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनके व्यक्तित्व में कहीं पर किसी भी प्रकार की अल्पता न रह जाए यही रचनाकारों का प्रयास आज उनके संपूर्ण व्यक्तित्व की झांकी प्रस्तुत करने में पूर्णकाम हुआ है।
यहां उनके जन्म काल के आधार पर उनका जन्मांक भी प्रस्तुत किया गया है।कृष्ण शब्द कृष् धातु से निर्मित है जिसका अर्थ आकर्षित करना या खींचना होता है। अर्थात मन को अपनी ओर खींचने वाला। वर्तमान में वे एक महापुरुष के रूप में ही नहीं भारतीय मनीषा में परब्रह्म पुरुषोत्तम के गौरवशाली पद पर प्रतिष्ठित हैं। लोक मानस में उनसे संबंधित कोटि-कोटि कथाएं भक्ति, श्रृंगार एवं अद्भुत रस की त्रिवेणी प्रवाहित कर रही हैं।
” रात औ द्योस जपौं सबै भूलिके ,जै वृषभानुजा, जै वनवारी।
लागै सनेह- समाधि निरंतर, रावरे की छवि की बलिहारी।।
‘शैल’ कहै जो कृपानिधि हौ, तौ करौ यों कृपा तुम कुंज बिहारी।
नैनन में बसै रूप तिहारो,औ प्रानन में बसौ बांके बिहारी।।”







