फतेहपुर, असंगठित कामगार और कर्मचारी कांग्रेस (KKC) के प्रदेश कोऑर्डिनेटर मिस्बाहुल हक़ ने केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह के उस बयान पर गंभीर चिंता जताई है, जिसमें सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान और भुगतान व्यवस्था को आधार के स्थान पर मतदाता पहचान पत्र (EPIC) नंबर से जोड़ने की बात सामने आई है।
मिस्बाहुल हक़ ने कहा कि यह केवल पहचान पत्र बदलने का मामला नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर नीतिगत विषय है। सरकार की जिम्मेदारी है कि राशन, पेंशन, आवास, मनरेगा मजदूरी और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्रत्येक पात्र नागरिक तक पारदर्शी तरीके से पहुंचे। यदि मौजूदा व्यवस्था में कमियां हैं तो उन्हें दूर करना सरकार का दायित्व है, न कि नागरिकों के अधिकारों को नई पहचान संबंधी शर्तों से बांधना।
उन्होंने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया पर जननायक राहुल गांधी सहित कई स्तरों पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में यदि सरकारी योजनाओं की पात्रता भी मतदाता सूची से जोड़ दी जाती है, तो किसी पात्र गरीब, मजदूर, बुजुर्ग या वंचित नागरिक का नाम मतदाता सूची में न होने के कारण उसकी सामाजिक सुरक्षा प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी नागरिक का नाम तकनीकी त्रुटि, दस्तावेजों की कमी, शिक्षा, रोजगार, बीमारी के उपचार या पलायन के कारण मतदाता सूची से हट जाता है, तो क्या उसकी पेंशन, राशन और सरकारी सहायता भी रुक जाएगी? क्या चुनावी पहचान अब नागरिक के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों का निर्धारण करेगी?
मिस्बाहुल हक़ ने कहा कि मतदाता पहचान पत्र लोकतंत्र की विश्वसनीयता, चुनाव की निष्पक्षता और नागरिक की राजनीतिक भागीदारी का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसे राजनीतिक निष्ठा अथवा सत्ता के पक्ष-विपक्ष में पहचान का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए। चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी प्रत्येक पात्र मतदाता के मताधिकार की रक्षा करना है। मतदाता सूची किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक धरोहर है।
उन्होंने केंद्रीय चुनाव आयोग से इस मामले में हस्तक्षेप करने और यह सुनिश्चित करने की मांग की कि मतदाता पहचान पत्र का इस्तेमाल निर्वाचन कार्यों तक ही सीमित रहे। उन्होंने कहा कि यदि राजनीतिक दलों के विरुद्ध मतदान करने की आशंका के आधार पर किसी मतदाता के साथ भेदभाव के आरोप लगते हैं, तो चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।
उन्होंने कहा कि देश के करोड़ों असंगठित श्रमिक, खेतिहर मजदूर, निर्माण कामगार, रेहड़ी-पटरी दुकानदार, ई-रिक्शा चालक, महिलाएं और बुजुर्ग सरकारी योजनाओं पर निर्भर हैं। ऐसे में सरकार को ऐसी पहचान व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, जो नागरिकों को सुविधा दे, न कि उनके अधिकारों में बाधा बने।







