Homeउत्तर प्रदेशफतेहपुरइस मंदिर में आज भी पूजा करने आते हैं अश्वत्थामा! मोटे महादेवन...

इस मंदिर में आज भी पूजा करने आते हैं अश्वत्थामा! मोटे महादेवन मंदिर में कौन सुबह ही शिवलिंग को पूज जाता है?

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नरसिंह मौर्य असोथर फतेहपुर

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के असोथर स्थित प्राचीन मोटे महादेव मंदिर और अन्य शिवालय महाशिवरात्रि पर अपनी अनूठी मान्यताओं के कारण विशेष हैं। मोटे महादेव में महाभारतकालीन अमर योद्धा अश्वत्थामा द्वारा गुप्त रूप से जल-फूल चढ़ाने और शिवलिंग के प्रतिवर्ष स्वतः बड़े होने की मान्यता है। यहाँ शिवरात्रि पर भक्तों का भारी सैलाब उमड़ता है। तो आइए जानते हैं मोटे महादेवन मंदिर का रहस्य..!

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के असोथर कस्बे में मोटे महादेवन मंदिर स्थित है। मंदिर की मान्यता है कि यहां प्रतिदिन अश्वत्थामा पूजा करते हैं। सुबह जब भी भक्त मंदिर पहुंचते हैं तो शिवलिंग पूजी हुई मिलती है। शिवलिंग पर पूजा के फूल और जल चढ़ा हुआ मिलता है। मंदिर का यह रहस्य आज भी बरकरार है। फतेहपुर जिले के सदर तहसील में असोथर कस्बा है। यह कस्बा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी के किनारे दक्षिणी सीमा पर स्थित है। इस कस्बे को 11वीं शताब्दी के मध्य राजा भगवंत राय खींची ने बसाया था।

ब्रह्मास्त्र के लिए यहीं पर की थी तपस्या

गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने महाभारत काल में ब्रम्हास्त्र पाने के लिए यहीं पर आकर तपस्या की थी। तभी से इस बस्ती का नाम असुफल हो गया, जो कालान्तर में असोथर के नाम से जाना जाने लगा। ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा आज भी अजर-अमर है और अपनी तपोस्थली और प्राचीन सिद्धपीठ मोटे महादेवन मंदिर में आज भी पूजा अर्चना करने आते हैं। ऐसा कहते हैं कि महाभारत काल में पांडव भी अज्ञातवास के दौरान यहाँ आकर टिके थे। मुख्य पर्यटक स्थलों के रूप में विख्यात पांडवकालीन प्राचीन मंदिर बाबा अश्वत्थामा धाम, सिद्ध पीठ मोटे महादेवन मंदिर असोथर के दक्षिण में स्थित है।

मंदिर में भक्तों की पूरी होती हैं मुरादें

मान्यता यह भी है कि आदिकाल से मोटे महादेवन मंदिर में अदभुत शिवलिंग असोथर में स्थापित है। जयपुर के राजा ने शिव मंदिर के महत्व को सुनने के बाद मंदिर का निर्माण करवाया था। सच्चे मन से जो भी इस मंदिर में मन्नत मानता है उसकी मुरादें पूरी होती हैं। शिवभक्तों का मानना है की मंदिर में स्थापित शिवलिंग ईशान कोण की ओर झुकी होने के साथ काशी विश्वनाथ की तरफ भी इसका रुख है।

शिवलिंग को निकालने में हुए थे असफल

मान्यता है कि अश्वत्थामा सफेद घोड़े में सवार होकर आज भी पूजा के लिए मोटे महादेवन मंदिर आते हैं। बकौल बुजुर्ग मोटे महादेवन मंदिर के पास एक तालाब था। गाँव के चरवाहे तालाब किनारे मवेशी चरा रहे थे। इस दौरान झाड़ियों में शिवलिंग देखकर लोगों को इसकी जानकारी दी। इसपर ग्रामीणों ने शिवलिंग को खोदकर निकालने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली तो लोगों ने उसी जगह शिवलिंग की पूजा करना शुरू कर दिया।

*मंदिर निर्माण के लिए जयपुर के राजा ने भेजा था धन*

बताते है कि एक बार राजा जयपुर बीमार हो गये थे। उस दौर में कई स्टेट के वैद्य राजा के इलाज के लिए गए थे। इन्हीं वैद्य में असोथर स्टेट के जोरावर महाराज भी थे। जयपुर जाने से पहले वैद्य जोरावर महराज ने मोटे महादेवन मंदिर में पूजा अर्चना की। सभी वैद्य राजा जयपुर का इलाज कर रहे थे, लेकिन सफल नहीं हुए। इसके बाद जोरावर महाराज ने अपना इलाज शुरू किया तो जयपुर के राजा स्वस्थ हो गए।

यह देख राजा के साथ लोगों को भी आश्चर्य हुआ। राजा ने इलाज के बारे में वैद्य जोरावर महाराज से जानकारी ली। इस पर मोटे महादेवन मंदिर का महत्त्व राजा के दरबार में बताया था। यह सुनकर राजा जयपुर ने वैद्य के साथ ऊँटों में धन भेजकर मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर में जो भी सच्चे मन से मन्नतें मांगता है उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ऐसा लोगों का मानना है।

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