
फतेहपुर। जनपद में मोरंग खनन लंबे समय से चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप है कि नियम-कायदों को ताक पर रखकर यमुना नदी में बड़े पैमाने पर अवैध और मानक विहीन खनन किया जा रहा है। मौजूदा समय में संगोलीपुर, ओती, कोर्रा, कनक और अढ़ावल क्षेत्र में खनन के दो खंड संचालित हैं, जहां नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के मानकों को दरकिनार करते हुए मनमाने तरीके से मोरंग निकासी की जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक खनन स्थलों पर बड़ी बूम वाली पोकलैंड मशीनों और अत्याधुनिक भारी मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि खनन नियमावली में ऐसी मशीनों के उपयोग की अनुमति नहीं है। खनन क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे लगाए तो गए हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि ये केवल औपचारिकता के लिए लगाए गए हैं और वास्तविक निगरानी नहीं होती।
यही कारण है कि खनन स्थलों से निकलने वाले ट्रकों में खुलेआम ओवरलोडिंग की जा रही है। ट्रकों में तय मानक से कहीं अधिक मोरंग भरकर परिवहन किया जा रहा है, जिससे सरकार को प्रतिदिन करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।
सबसे गंभीर बात यह बताई जा रही है कि खनन क्षेत्रों में बाहरी लोगों को वीडियो या फोटो बनाने की अनुमति नहीं दी जाती। कई बार वहां मौजूद दबंग तत्व खुलेआम धमकी देते नजर आते हैं। खनन क्षेत्र में तैनात कुछ गनमैनों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि बताया जाता है कि जिनके हाथों में हथियार हैं, वे शस्त्र उनके नाम पर दर्ज नहीं हैं।
सूत्रों का यह भी दावा है कि पूरे मामले में एक संगठित तंत्र काम कर रहा है, जिसमें खनन प्रबंधन, पुलिस, खनन विभाग, एआरटीओ, कुछ सफेदपोश नेताओं और इलाके के प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत की चर्चा है। इतना ही नहीं, कुछ कथित पत्रकारों पर भी आरोप है कि उन्होंने खबर न प्रकाशित करने का मानो ठेका ले रखा है।
लगातार हो रहे इस तरह के मानक विहीन खनन से जहां सरकार को भारी राजस्व हानि हो रही है, वहीं यमुना नदी के पर्यावरण पर भी इसका गंभीर असर पड़ रहा है। नदी के किनारे रहने वाले अनेक जलीय जीव-जंतुओं और पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले समय में यमुना क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ सकता है।






