फिरोजाबाद के टूंडला क्षेत्र के त्रिलोकपुर गांव में मामूली लगने वाला विवाद अचानक हिंसक हो गया। उपले (गोबर के कंडे) तोड़ने को लेकर शुरू हुई कहासुनी ने इतना तूल पकड़ा कि फायरिंग हो गई, जिसमें दो महिलाओं समेत तीन लोग घायल हो गए। लेकिन इस घटना ने एक बड़े सवाल को भी सामने ला दिया है—क्या रसोई गैस की किल्लत और महंगाई के चलते ग्रामीण इलाकों में ‘उपलों’ की अहमियत फिर बढ़ रही है?
क्या हुआ उस रात?
शुक्रवार देर रात गांव में अचानक गोलियों की आवाज गूंज उठी।
उपले तोड़ने को लेकर पड़ोसियों में विवाद हुआ, जो देखते ही देखते खूनी संघर्ष में बदल गया।
घायलों में नीलम, रेखा और 12 साल का मोहित शामिल
तीनों को गोली लगने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया
पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पड़ोसी ओम प्रकाश और उसके साथियों ने विवाद बढ़ने पर फायरिंग की।
उपले (कंडे) — सिर्फ ईंधन नहीं, जरूरत बनते जा रहे
ग्रामीण भारत में उपले कोई नई चीज नहीं हैं, लेकिन हाल के समय में इनकी अहमियत फिर बढ़ती दिख रही है।
क्यों बढ़ी मांग?
रसोई गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमत कई जगहों पर गैस सप्लाई में अनियमितता
गरीब और निम्न आय वर्ग का सस्ता विकल्प तलाशना
उपलों की खासियत
कम खर्च: गोबर से घर में ही तैयार आसान उपलब्धता: गांवों में सहज पर्यावरण अनुकूल: लकड़ी या कोयले से कम नुकसान लंबे समय तक जलने की क्षमता
लेकिन विवाद क्यों?
जहां एक ओर उपले सस्ते ईंधन हैं, वहीं अब ये “संसाधन” बनते जा रहे हैं।
गांवों में: गोबर इकट्ठा करने की होड़ सूखने की जगह को लेकर झगड़े पशुधन कम होने से कंडों की कमी इन वजहों से छोटे-छोटे विवाद भी बड़े झगड़ों में बदल रहे हैं, जैसा कि इस घटना में हुआ।
पुलिस क्या कह रही
पुलिस के अनुसार:आरोपियों की तलाश जारी मामले की गंभीरता से जांच गांव में तनाव को देखते हुए पुलिस बल तैनात
बड़ा सवाल
क्या महंगी गैस और संसाधनों की कमी ग्रामीण समाज को फिर पुराने ईंधनों की ओर धकेल रही है?
और अगर हां, तो क्या प्रशासन को इस दिशा में ठोस नीति बनाने की जरूरत है?







