अगहन की शुक्ल पक्ष की पंचमी इस बार 25 नवंबर को पड़ रही है। यह वही तिथि है जब सायंकाल की वेला में भगवान शंकर का परांबा पार्वती प्रपूजित त्रिपुर संहारी चैतन्य चारु चाप पिनाक अजगव त्रिलोकी के राजकुमारों के बलाबल का परीक्षण करता हुआ संवत्सर भर से संचालित शीरध्वज जनक के विशाल मैथिली स्वयंवर पांडाल के अंतर्गत भगवान राम के हाथों दो खंडों में विभाजित हो गया था और “कुंवरि मनोहरि, विजय बड़ि कीरति अति कमनीय”के रूप में अयोनिजा शौर्यशुल्का भगवती सीता के कर कमलों वे कौशल्यानंदन राघवेंद्र सरकार जयमाल से सुशोभित हुए थे।
“टूटत ही धनु भयउ विवाहू” के आधार पर विवाह उसी समय संपन्न मान लिया गया लेकिन वैदिक विधि – विधान के अनुसार धनुर्भंग के चौथे दिन जब राजर्षि दशरथ राज – समाज के साथ मिथिला पहुंचे तभी समस्त वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित होना प्रारंभ हुए।
मिथिला में विवाह के रीति रिवाज कुछ अलग ही हैं। वहां पहले दिन केवल तीन भांवरे ही पड़ती हैं । बाद में चौथे दिन बाकी की चार भांवरें । इसी रात्रि को वहां मायके में ही सुहागरात संपन्न होती है।
मिथिला में राम की बारात एक महीने से अधिक ही रुकी थी। वहां अब भी शादी में दूल्हे को 10 -15 दिन ससुराल में रहना अनिवार्य है। प्राचीन समय में शादी के तुरंत बाद दुल्हन ससुराल नहीं जाती थी। वह शादी के साल भर बाद गौना होने पर ही अपनी ससुराल जाती थी। हां , उसका पति सावन में एक महीने के लिए अपनी ससुराल आ सकता था।
“जो जन गेह रचावहीं, राम- सिया को ब्याहु।
तिन घर निश्चय होत नित- नूतन हरष- उछाहु।।”
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मार्गशीर्ष शुक्ला पंचमी – श्री राम विवाह उत्सवलेखक- शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी
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