Homeउत्तर प्रदेशफतेहपुरविविध रामलीलाएँ: उद्भव और विकासलेखक: शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी

विविध रामलीलाएँ: उद्भव और विकासलेखक: शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी

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रामलीला की वैश्विक पहचान -रामलीला भारतीय संस्कृति, आस्था और लोकपरंपरा का ऐसा जीवंत स्वरूप है, जिसने देश की सीमाओं को पार कर विश्वभर में अपनी पहचान बनाई है। भारत के अतिरिक्त कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड सहित अनेक देशों में रामलीला विभिन्न रूपों, शैलियों और मुखौटों के साथ मंचित की जाती है। यूनेस्को ने रामलीला की परंपरा को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है। भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र, मर्यादा, त्याग और लोककल्याण की भावना ने इस परंपरा को व्यापक विस्तार प्रदान किया।

साहित्य से मंच तक का सफर

रामकथा की नाट्य परंपरा का विकास वाल्मीकि रामायण से प्रेरित होकर अनेक साहित्यकारों की रचनाओं के माध्यम से हुआ। महाकवि भास और भवभूति जैसे रचनाकारों ने रामकथा को नाटकीय स्वरूप प्रदान किया। मध्यकाल में गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस ने रामलीला के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। काशी की रामलीला और रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला इसी व्यापक परंपरा से जुड़ी हैं। महाकवि केशवदास की रामचंद्रिका तथा रीवा नरेश राजा रघुराज सिंह का योगदान भी इस साहित्यिक यात्रा में उल्लेखनीय है।

उन्नीसवीं से इक्कीसवीं शताब्दी तक राधेश्याम जी, रूपराम त्रिपाठी, सुशील जी, कमलू दास और स्वयं शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी सहित अनेक साहित्यकारों ने रामलीला के लिए लेखन किया। कई कलाकारों ने अपनी अभिनय-शैली के अनुरूप गद्य-पद्य संवाद रचे, तो कुछ ने प्रतिष्ठित साहित्यकारों की रचनाओं को मंच पर स्थान दिया।

उत्तर भारत और फतेहपुर की विशिष्टता

उत्तर भारत में बांदा, हमीरपुर, इटावा, कानपुर और फतेहपुर रामलीला की समृद्ध परंपरा के प्रमुख केंद्र रहे हैं। इन क्षेत्रों में परशुरामी, रावण-बाणासुर संवाद और जनक-विलाप जैसे प्रसंग अपनी विशिष्ट शैली के लिए प्रसिद्ध हैं। कानपुर की परेड रामलीला में मथुरा-वृंदावन के कलाकारों की भागीदारी ने इसे अलग पहचान दी है।

बदलता स्वरूप और चुनौतियाँ

वर्तमान समय में रामलीला के स्वरूप में अनेक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। श्रीराम के संपूर्ण जीवन पर आधारित मंचन कम होते जा रहे हैं और कई स्थानों पर आयोजन धनुष-भंग तथा रावण-दहन तक सीमित हो गए हैं। पद्यात्मक संवादों की जगह गद्य प्रधान होता जा रहा है। कुछ मंचनों में रामकथा की मूल भावना से अधिक शास्त्रार्थ और विद्वत्ता-प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाता है।

इसके अतिरिक्त मंचीय अनुशासन में कमी, नशीले पदार्थों का प्रयोग, असुरक्षा और मोबाइल युग में बदलती मनोरंजन की आदतें भी रामलीला के सामने चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही हैं।

संस्कारों की पुनर्स्थापना आवश्यक

रामलीला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को आदर्श जीवन-मूल्यों से जोड़ने का माध्यम है। इसके मंचन में मर्यादा, अनुशासन, साहित्यिक गरिमा और सांस्कृतिक शुचिता का संरक्षण आवश्यक है। राम के चरित्र का अभिनय तभी सार्थक होगा, जब उनके आदर्श कलाकारों और दर्शकों के जीवन में भी दिखाई दें।

“मंचन में श्रीराम का, लेते चरित उतार। पर, सब यह भी चाहते, हों उत्तम संस्कार।। ”

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