लेखक: शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी
5 मार्च 2026 को जनपद फतेहपुर ही नहीं, बल्कि समूचा देश राष्ट्रकवि पद्मश्री पंडित सोहनलाल द्विवेदी की 121वीं जयंती श्रद्धा और सम्मान के साथ मना रहा है। उनका जन्म 5 मार्च 1905 को उत्तर प्रदेश के बिंदकी में बिंदा प्रसाद द्विवेदी के घर हुआ था। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी, संवत 1961 की यह तिथि उनकी हस्तलिपि में अंकित जन्मकुंडली में भी उल्लिखित है।
स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरक कवि
द्विवेदी जी की कविताओं ने स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों में ऐसा जोश भरा कि भारत माता की वलिवेदी वीर सपूतों के बलिदानों से आप्लावित हो उठी। अनगिनत देशभक्तों ने उनके देशभक्ति गीत गाते हुए हंसते-हंसते फांसी के फंदे चूम लिए। अंग्रेजों की लाठियां, कोड़े और कारावास का भय उनके अदम्य उत्साह को डिगा नहीं सका।
उनका प्रथम कविता संग्रह ‘भैरवी’ (1941) प्रकाशित होते ही पूरे हिंदुस्तान में चर्चित हो गया। “वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो”, “चल पड़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर”, “मेरे भारत के कर्णधार, जागते रहो हो खबरदार” जैसे गीत आज भी राष्ट्रप्रेम की ऊर्जा से ओत-प्रोत हैं।
साहित्य-साधना और प्रमुख कृतियां
द्विवेदी जी का संपूर्ण साहित्य देशभक्ति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को समर्पित रहा। उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में पूजागीत, प्रभाती, युगाधार, चित्रा, वासंती, कुणाल, विषपान, चेतना, सुजाता, वासवदत्ता, मुक्तिगंधा, शिशुभारती, बालभारती, बिगुल, बच्चों के बापू, बांसुरी, चाचा नेहरू आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
सन् 1983 में उनकी अंतिम कृति ‘संजीवनी’ प्रकाशित हुई, जो उनकी साहित्य-यात्रा का सार मानी जाती है।
व्यक्तिगत संस्मरण और विरासत
लेखक शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी के अनुसार, सन् 1981 से 1988 तक उन्हें राष्ट्रकवि का सान्निध्य प्राप्त हुआ। वे उनके लिए केवल मुंह बोले पितामह ही नहीं, बल्कि काव्य-गुरु भी थे। उनके आशीर्वाद से लेखक की काव्य-शैली को दिशा और दृढ़ता मिली।
28 फरवरी और 1 मार्च 1988 की अर्धरात्रि में कानपुर में उनका निधन हुआ। उनके जाने से हिंदी साहित्य और राष्ट्रकाव्य की एक उज्ज्वल धारा अवरुद्ध हुई, पर उनकी वाणी आज भी प्रेरणा देती है।
राष्ट्र का नमन
आज उनकी 121वीं जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें शत-शत नमन करता है।
“गूंज उठी भैरवी, भर गई वलिदानों से वेदी,
अजर-अमर कल्पांत राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी।”






