



फतेहपुर (असोथर)। सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही फतेहपुर जनपद का ऐतिहासिक कस्बा असोथर “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयघोष से गूंज उठता है। यहां स्थित प्राचीन श्री मोटेमहादेव बाबा धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। भोर से ही भक्त गंगाजल, दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित कर भगवान शिव का जलाभिषेक व रुद्राभिषेक करते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करते हैं।
श्री मोटेमहादेव बाबा मंदिर को फतेहपुर जनपद के सबसे प्राचीन और प्रमुख शिवधामों में गिना जाता है। मंदिर के निर्माण से जुड़े प्रमाणिक ऐतिहासिक अभिलेख भले ही उपलब्ध न हों, लेकिन स्थानीय जनश्रुतियों और परंपराओं के अनुसार यह धाम कई सौ वर्ष पुराना है। समय-समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार और विस्तार होता रहा, जिससे इसकी धार्मिक गरिमा आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है।
मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी विशाल और गोलाकार आकृति के कारण विशेष पहचान रखता है। इसी विशिष्ट स्वरूप के चलते श्रद्धालुओं ने भगवान शिव को प्रेमपूर्वक “मोटेमहादेव बाबा” कहना शुरू किया और यही नाम आज पूरे क्षेत्र की आस्था का प्रतीक बन चुका है।
इस धाम की सबसे चर्चित मान्यता महाभारत के अमर योद्धा अश्वत्थामा से जुड़ी है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि भगवान श्रीकृष्ण के शाप से चिरंजीवी हुए अश्वत्थामा आज भी ब्रह्ममुहूर्त में यहां आकर भगवान शिव की पूजा करते हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि सुबह मंदिर के कपाट खुलने पर शिवलिंग पर पहले से जल, बेलपत्र और पुष्प चढ़े हुए मिलते हैं। हालांकि इस मान्यता का कोई स्वतंत्र ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इसे धार्मिक लोकविश्वास के रूप में ही देखा जाता है।
लोक परंपराओं में यह भी माना जाता है कि महाभारत काल में अश्वत्थामा ने इसी क्षेत्र में भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। कुछ जनश्रुतियां पांडवों के अज्ञातवास और असोथर के प्राचीन नाम “असुफल” को भी इस क्षेत्र से जोड़ती हैं। वहीं स्थानीय मान्यता के अनुसार 17वीं शताब्दी में खींची वंश के शासक राजा भगवंत राय ने मंदिर का निर्माण अथवा जीर्णोद्धार कराया था।
सावन के प्रत्येक सोमवार, नागपंचमी, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप, शिव चालीसा पाठ, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा परिसर भक्तिमय बना रहता है। मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख स्थल है, जहां वर्षभर भंडारे, सुंदरकांड पाठ, धार्मिक कथाएं और भजन संध्या आयोजित होती रहती हैं।
आज श्री मोटेमहादेव बाबा धाम फतेहपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के जनपदों और मध्य प्रदेश तक के श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बन चुका है। सावन में यहां मेले जैसा माहौल रहता है और श्रद्धालुओं की सुविधा व सुरक्षा के लिए प्रशासन की ओर से विशेष व्यवस्थाएं भी की जाती हैं। आस्था, इतिहास और लोकविश्वास का यह अद्भुत संगम श्री मोटेमहादेव बाबा धाम को दोआबा और बुंदेलखंड क्षेत्र की महत्वपूर्ण धार्मिक पहचान बनाता है।







