
25 अप्रैल 2026 को वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर सीता नवमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह वही शुभ दिन माना जाता है जब माता सीता का प्राकट्य मिथिला की पवित्र भूमि पर हुआ था।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पुंडरीक क्षेत्र में यज्ञभूमि के शोधन के दौरान राजा जनक द्वारा हल चलाते समय धरती से एक नवजात कन्या के रूप में माता सीता प्रकट हुई थीं। इसी कारण उन्हें धरणिजा और जानकी नामों से भी जाना जाता है।
हालांकि, कुछ मतों में उनके जन्म की तिथि फाल्गुन कृष्ण अष्टमी (जो 9 फरवरी 2026 को पड़ चुकी है) भी मानी जाती है।
शास्त्रों में वर्णन
शतकोटि (आनंद) रामायण में माता सीता के प्राकट्य का वर्णन इस प्रकार मिलता है:
धरण्या निर्गता यस्मात्, तस्मात् धरणिजेति च।
जनके पालिता यस्मात्, जानकीति प्रकीर्तिते।।
सीरग्रान्निर्गता यस्मात्, सीतेत्यग्र प्रगीयते।।
सीता नवमी का आध्यात्मिक महत्व
माता सीता को सृष्टि की क्रियाशक्ति और शक्ति स्वरूपा माना गया है। वे न केवल नारी शक्ति की प्रतीक हैं बल्कि भगवान राम की प्रेरक शक्ति भी हैं।
अगर माता सीता का अस्तित्व न होता, तो भगवान राम की अनेक लीलाएं अधूरी रह जातीं। वे त्याग, धैर्य और मर्यादा की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं।
पूजन का शुभ मुहूर्त
सीता नवमी पर पूजा का विशेष महत्व है।
पुण्य काल: सुबह 7:30 बजे से 10:00 बजे तक
इस समय भगवान राम और माता सीता की संयुक्त पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
भक्ति भाव
“मां सीता सी विश्व में, कौन दूसरी और।
विविध कष्ट सहकर हुईं, सतियों में सिरमौर।।”
यह पर्व हमें त्याग, सहनशीलता और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।






