Homeउत्तर प्रदेशफतेहपुरगांधी युग के सफल शब्दशिल्पी पंडित सोहनलाल द्विवेदी लेखक --शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी

गांधी युग के सफल शब्दशिल्पी पंडित सोहनलाल द्विवेदी लेखक –शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी

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           भाग 1

राष्ट्रभाषा हिंदी के माथे में सौभाग्य सूचक बिंदी लगाने वाले मां भारती के अनोखेलाल, बिंदकी के वर्चस्वी  उशना कवि, गांधीवाद के चतुर चितेरे ,भारतीय संस्कृति  के अमर गायक ,बच्चों के माई-बाप ,स्वनाम धन्य साहित्यिक सेनानी, प्रभविष्णु व्यक्तित्व केधनी ,पद्मश्री ,साहित्य  वाचस्पति   राष्ट्रकवि पं. सोहनलाल  द्विवेदी का जन्म 5 मार्च सन 1905 तदनुसार फाल्गुन शुक्ल अष्टमी विक्रम संवत 1961 (इस लेख के लेखक को प्रदान की गई उनकी सन 1956 की दैनंदिनी में उन्हीं के हस्तलिपि में )श्रीबिंदाप्रसाद जी द्विवेदी के कनिष्ठ पुत्र के रूप में हुआ । इनके अग्रज का नाम श्री मोहनलाल द्विवेदी था। इनके पिता अत्यंत संपन्न संस्कृतिनिष्ठ सर्व सम्मानित ब्राह्मण तथा उस युग के उच्च कोटि के जमीदारों में से एक थे। उनकी संपन्नता तथा उदारता की कथाएं अब भी बिंदकीके बुजुर्गों के मुख से सुनी जा सकती हैं ।द्विवेदी जी अत्यंत लाड प्यार से पाले गए राजकुमारों की तरह रहते थे। उनके पिता तुल्य स्नेह करने वाले बड़े भाई पैतृक व्यवसाय की देखभाल करते थे और घर गृहस्थी की सारी व्यवस्था से इन्हें सर्वथा मुक्त रख स्वेच्छानुसार व्यय करने का ही अधिकार और कर्तव्य प्रदान किए हुए थे। ऐसे उदार हृदय और स्नेहशील बड़े भाई के आकस्मिक निधन के उपरांत ही गृहस्थी का सारा भार उनके कंधों पर आया ‌।उनके पिताजी का निधन सन 1912 में तथा अग्रज का सन 1946 में हुआ।
  सन 1920 के आसपास तक द्विवेदी जी का अध्ययन उनके घर पर ही हुआ ।सन 1921 में एंग्लो संस्कृत स्कूल फतेहपुर (वर्तमान ए . यस. इंटर कॉलेज ) में प्रवेश दिलाया गया । सन् 1921 के आसपास से इन्होंने काव्य लेखन भी आरंभ किया और इनकी रचनाएं उस जमाने की शिशु ,गृह लक्ष्मी, बंगवासी एवं बालसखा जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में ससम्मान स्थान पाने लगीं ।इसी वर्ष इनका आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित ‘चर्पट पंजारिका’ का ‘मोह मुग्दर’ नाम से पद्यानुवाद आनंद प्रेस फतेहपुर से प्रकाशित हुआ। सन 1925 में गवर्नमेंट हाई स्कूल फतेहपुर( वर्तमान जीआईसी फतेहपुर) से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1928 में ‘त्याग भूमि’ जिसके संपादक हरि भाऊ उपाध्याय जी थे ,में ‘राणा प्रताप’ नाम की कविता का प्रकाशन हुआ । जिसने इन्हें राष्ट्रीय कवि के उच्च आसन पर प्रतिष्ठित कर दिया। इस कविता को इतना अधिक महत्व मिला की श्रीधर पाठक द्वारा प्रयाग हिंदू बोर्डिंग हाउस में इन्हें स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया गया।
सन् 1929 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में इन्होंने बीए की पढ़ाई करने के लिए प्रवेश लिया तथा इसी वर्ष विश्वविद्यालयी भाषण प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्रदान कर विजयी घोषित किए गए‌। यह महामना मदन मोहन मालवीय, आचार्य रामचंद्र शुक्ल  तथा श्यामसुंदर दास आदि के अत्यंत चहेते विद्यार्थियों में से एक थे। इनकी कविताओं का रंग उस समय विश्वविद्यालय में सब के ऊपर चढ़कर बोल रहा था। वास्तव में यह उस समय काशी विश्वविद्यालय के हीरो माने जाते थे। सन 1930 में वहीं की अत्यंत प्रतिष्ठित रिकॉर्डिंग कंपनी द्वारा खादीगीत नाम की कविता की रिकॉर्डिंग कराई गई और महात्मा गांधी को अत्यंत समारोह पूर्वक वह समर्पित की गई । इसी वर्ष इन्होंने इस विश्वविद्यालय से बीए की उपाधि अर्जित की। सन् 1931 में प्रयाग विश्वविद्यालय में एलएलबी के अध्ययन के लिए प्रवेश लिया तथा ‘शहीद आजादी’ नाम की काव्य पुस्तक का प्रकाशन कराया जिसे तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने तुरंत जप्त कर लिया। सन् 1935 में प्रयाग विश्वविद्यालय से एमए ,एल एल बी पूर्ण करके फतेहपुर में वकालत की ट्रेनिंग ली ‌इसी वर्ष ये जिला परिषद फतेहपुर के सदस्य निर्वाचित हुए और सन् 1943 तक बने रहे।
  सन् 1938 से 1944 तक लखनऊ से प्रकाशित प्रथम दैनिक समाचार पत्र अधिकार का संपादन किया। सन 1941 में इंडियन प्रेस इलाहाबाद से भैरवी का प्रकाशन बड़े ही सज -धज के साथ हुआ और उसका जनता के बीच हाथों-हाथ इतना स्वागत हुआ कि प्रकाशन के दूसरे वर्ष ही  सन् 1942 में उसका दूसरा संस्करण निकालना पड़ा। इसी वर्ष इसी प्रेस  से वासवदत्ता एवं पूजा गीत का भी प्रकाशन हुआ। यदि भैरवी ने  इन्हें गांधी युग के राष्ट्रीय अमर गायक के रूप में प्रतिष्ठा प्रदान की तो वासवदत्ता ने इन्हें साहित्य के उच्चतम प्रकर्ष पर प्रतिस्थापित किया । निराला जी ने वासवदत्ता पढ़कर लिखा- देखकर चित्त प्रसन्न हुआ ।मुक्त छंद का निर्वाह सुंदर हुआ है ‌मैं इसका समधिक प्रचार चाहता हूं। इससे लोगों की बुद्धि परिमार्जित और हृदय प्रसारित होगा। डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा- कविवर रविंद्रनाथ टैगोर जैसे कवि ने जिस विषय को स्पर्श किया हो उस पर फिर से कुछ कहना काफी कठिन काम है। भाई सोहनलाल जी ने इस कठिन कार्य को किया है। हरिभाऊ उपाध्याय ने भैरवी की समीक्षा में एक स्थान पर लिखा है – द्विवेदी जी की रचनाओं में सबसे बड़ा गुण मैंने पाया है प्रभाव  वा प्रसाद । उनका शब्द सामर्थ्य वाण की याद दिलाता है। उनका गाने का अपना अनोखा ढंग है। श्रोता मंत्र मुग्ध हो जाता है। सोहनलाल जी दुर्बलता, पीड़ा रोदन आंसू के नहीं जीवन, उत्साह ,तारुण्य, वेग, प्रभाव एवं बल के कवि हैं ।
पंत जी लिखते हैं – उनकी कविता सुविज्ञ साहित्यिकों की ही नहीं जनता जनार्दन की भी प्रिय वस्तु है ।उनकी सरल , प्रसादमयी भाषा, सहज भावुकता ,सुबोध कल्पना तथा विश्वास एवं भावनामयी देशभक्ति जनता के लिए विशेष आकर्षक है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनकी कविता के बारे में लिखा है- -उनकी कविता सीधे हृदय से निकलती हुई हमारे मर्म को स्पर्श करती है और चिरस्थाई प्रभाव उत्पन्न करती है श्री द्विवेदी जी को जीवन के मर्म स्पर्शी पक्ष की पूरी परख है ।उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण यही है।
सेवाग्राम से महात्मा गांधी ने 16 अक्टूबर 1944 में इनकी कृति भैरवी के संदर्भ में लिखा -भाई सोहनलाल जी ,
  आपकी कृति के गुण दोष के बारे में क्या कहूं ।काव्य की परीक्षा करने की मेरे में कोई योग्यता नहीं पाता ।मेरी स्तुति में जो काव्य लिखे गए हैं, उनके बारे में मैं क्या कह सकता हूं। इतना मैं अवश्य कह सकता हूं। सही आपने परिश्रम काफी उठाया है। कोई भी शुभ परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता।
  उनकी कविता के प्रशंसकों में मालवीय जी, नेहरु जी ,डॉक्टर बड़थ्वाल ,सूर्य नारायण व्यास, जैनेंद्र कुमार, मैथिली शरण गुप्त आदि सभी थे। मालवीय जी ने यहां तक कहा- मैं चाहता हूं, ऐसी कविता का देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक प्रचार हो। और देश काल इसका साक्षी है कि वैसा हुआ भी।
सन् 1944 में गांधी अभिनंदन ग्रंथ का प्रकाशन अवध पब्लिशिंग हाउस लखनऊ से पहली बार हुआ जो बापू को उनकी हीरक जयंती के अवसर पर 10,000 की चेक के साथ प्रदान किया गया। यह चेक महादेव देसाई स्मारक के निमित्त प्रदान की गई थी। घनश्याम दास बिड़ला ने इस ग्रंथ के लिए 5000 की चेक प्रदान की थी। जिसे ससम्मान 10,000 की चेक के साथ वापस कर दिया गया।     सन् 1948 में चेतना तथा सन् 1956 में जय गांधी का प्रकाशन इंडियन प्रेस इलाहाबाद से हुआ। 1957 से 1968 तक इसी प्रेस   से प्रकाशित बाल सखा का संपादन किया जिससे इस बाल पत्रिका ने सफलता एवं प्रसिद्धि के नित नूतन सोपान चढ़े और गढ़े  भी। सन् 1962 में भारत सरकार द्वारा नेपाल भेजे गए साहित्यिक शिष्टमंडल का नेतृत्व किया। सन् 1964 में इन्हें नगर पालिका बिंदकी का सर्व सम्मति से अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। सन 1969 में राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर से उस विश्वविद्यालय की सर्वोच्च उपाधि साहित्य चूड़ामणि से सम्मानित किया गया।  14 सितंबर 1969 में आदर्श इंटर कॉलेज कोड़ा जहानाबाद फतेहपुर में एक अत्यंत भव्य समारोह में ‘एक कवि एक देश’ नामक अभिनन्दन ग्रन्थ समर्पित कर इनकी साहित्यिक प्रतिभा को प्रणति प्रस्तुत की गई।  26 जनवरी 1970 में तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम वाराह वेंकट गिरि द्वारा इन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
वास्तव में उनकी कविता भारतीय संस्कृति का अमर संगीत है। इन्हें उसमें जो भी सुंदरतम लगा, अपनी वाणी देकर उसे गौरवान्वित करने का पूर्ण प्रयास किया। इनके काव्य की सबसे बड़ी विशेषता सर्वग्राह्यता, सरलता एवं संस्कारशीलता है। वह स्वस्थ मानस से प्रवाहित होती मंदाकिनी है जिसमें कुंठा एवं कामुकता जैसे गर्हित गंदे नालों का जल अप्रवेश्य तथा सर्वथा वर्जित है।
  डॉ रामकुमार वर्मा , गोपाल दास ‘नीरज’  जैसी नामचीन हस्तियों को प्रथम बार काव्य मंचों में प्रस्तुत करने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। यदि प्रभाती, पूजा गीत ,भैरवी युगाधार चेतना इत्यादि गांधीवादी राष्ट्रीयता के सितार के तार झंकार रहीं हैं तो कुणाल, वासवदत्ता, सुजाता, संजीवनी इनके सांस्कृतिक काव्य वैभव का मनोहारी स्वरूप प्रस्तुत करती हैं ।चित्रा और वासंती में कवि की कलित कोमल कल्पनाओं कुसुमित कामनाओं के  बिम्ब उभर- उभर कर श्लील श्रृंगारिक चित्र उकेर  रहे हैं।
   इन्होंने यदि किशोरों एवं नवयुवकों को कुणाल सन 1942, चित्रा 1943 ,वासंती 1943, युगाधार 1944, प्रभाती 1944 ,विषपान 1945, चेतना 1953, सुजाता 1954 ,मुक्ति गंधा 1972 ,संजीवनी 1983 , दी तो बाल गोपालों के हाथ में भी दूध बताशा 1930 ,पांच कहानियां  1940, सात कहानियां 1940, मोदक 1940, बिगुल 1944 ,शिशुभारती 1949 , बाल भारती 1953, झरना 1953 ,बच्चों के बापू 1956 ,बांसुरी 1957 ,हंसो हंसो 1960, चाचा नेहरू 1963 ,दश कहानियां 1963 ,इत्यादि थमाए।
  उनकी पुस्तकें बड़े ही सजी- संवरी, रंग-बिरंगे मोहक चित्रों से युक्त प्रकाशित हुआ करती थीं ।इसमें छोटे बच्चों के लिए प्रकाशित की गई पुस्तकों की सजावट का तो कहना ही क्या। भैरवी, पूजा गीत ,चेतना इत्यादि राष्ट्रीय कविताओं की पुस्तकें भी भीतर कई कई रंगीन भावपूर्ण चित्रों से युक्त ही प्रकाशित हुई थीं।इनका प्रकाशकों से सदैव कहना रहा कि मुझे रॉयल्टी चाहे जितनी कम देना लेकिन किताब खूब शानदार छपनी चाहिए। इन्हें अपनी पुस्तकों में 5% से लेकर 15% तक रॉयल्टी मिलती थी।
  खादी की धवल धोती, कुर्ता गांधी टोपी, उत्तरीय तथा साधारण पादुकाओं से ही इनका सादगी भरा व्यक्तित्व अपनी दिव्यता की मोहकता सर्वत्र प्रसरित करता रहता था। आज और आज के पहले  पीढ़ी के जाने कितने कवि धुरंधरों  ने उनकी कविताएं पढ़-पढ़ कर कविता लिखना सीखा है । उन्मुक्त वातावरण में सहज शालीनता से बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात कहना उनका मुख्य गुण था । वे प्रत्येक कार्य सहज भाव से करते तथा दूसरों से भी ऐसी ही अपेक्षा करते थे ।बनावटीपन न उनमें था, न वे उसे पसंद ही करते थे। अपनी सरलता एवं स्नेह सौजन्य के कारण छोटे से छोटे  अभ्यागत की सुख सुविधा का वे पूरी सजगता से ध्यान रखते थे ।व्यर्थ की बकवास , आलस्य ,समय की बर्बादी ,साधनों का दुरुपयोग अथवा अनुप्रयोग उन्हें ना पसंद थे। सन् 1980 के आसपास से ही वे बाहर कम ही जाते थे। प्रायः बिंदकी में ही रहना होता था । सन् 1984 के लगभग पैर में फ्रैक्चर हो जाने से तो अपने पूर्व निवास का जीना चढ़ना तक कष्टकर हो गया था ।इसके पहले तक वह अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीयुत रामगोपाल द्विवेदी के पास रहा करते थे। बाद में कनिष्ठ पुत्र श्री युत प्रभु दयाल द्विवेदी के पास ही रहने लगे और मृत्यु पर्यंत (1 मार्च 1988 तक) वहीं रहे। 
उनकी प्रसिद्धि एवं साहित्यिक प्रतिष्ठा के अनुरूप बिंदकी में उनका सम्मान न होने पर भी वह उतने से ही संतुष्ट एवं प्रसन्न थे। उनके पास आने -जाने ,उठने- बैठने वाले लोग भी यहां कम ही थे । जिंदगी की आपाधापी  में किसे इतनी फुर्सत थी कि बिना आवश्यकता के उनके पास अपना बहुमूल्य समय गंवाता। वास्तव में वे इस सबके अभ्यस्त भी हो गए थे। किसी को पत्र लिखते तो उसके अंत में लिख देते ‘पत्र का उत्तर मिले तो अच्छा, ना मिले तो और अच्छ।’
  कोई नया अधिकारी वहां नियुक्त होकर आता और उनसे मिलने आता तो उसे समझा देते- देखो, तुम यहां आए हो। लोग मेरे ऊपर तुमसे तरह-तरह के उल्टे- सीधे काम करवाने का दबाव डालेंगे इसलिए मैं पहले से ही कहे दे रहा हूं कि तुम मेरी किसी बात पर कभी ध्यान मत देना। करना वही, जो तुम्हें ठीक लगे। और अब अधिक मेरे पास मत आना।
बदलती हुई दुनिया पर भी उनकी गहरी नजर थी ।किसी के ऊपर अपने उपदेशों को थोपना वे कतई अच्छा नहीं समझते थे। एक बार एक महाशय प्रयाग विश्वविद्यालय के छात्र को उनसे मिलाने लाये। उस छात्र ने बाबा जी (श्रीयुत सोहनलाल द्विवेदी) से पूछा कि आप मुझे क्या शिक्षा देना चाहेंगे तो बोले, तुम्हें मैं क्या सिखा सकता हूं ।जब मैं विद्यार्थी था तो विष्णु भगवान को सुंदर माना जाता था ।आज अमिताभ बच्चन को लोग मानते हैं। मेरे और तुम्हारे युग में बहुत फर्क आ गया है। आज की परिस्थिति में जो उचित जान पड़े ,तुम करो और करते रहो ।
उन्हें लोगों का अस्त व्यस्त,अवस्थित ,बिना सलीके के रहना, उठना- बैठना तथा बिना रोजी-रोटी का कोई जुगाड़ किए कविता लिखने के पीछे दीवानों सा लगे रहना, ठीक नहीं जचता था। वह प्रायः समझाते – कविता सुगंध है ,सुगंध सोने में ही शोभा पाती है ।पहले सोना इकट्ठा करो। फिर कविता करना । ‘सोने में सुहागा’ कहावत सुनी है कि नहीं?  उन्हें सलीके से   न रहने वाला आदमी बिल्कुल नापसंद था । एक बार एक महाशय मध्य प्रदेश के किसी व्यक्ति को उनके पास लिवा ले गए ।जिसके कपड़े गंदे -संदे ,बुर्शट की गले और कलाई के बटनें  टूटी, दाढ़ी और सर के बाल बेतरतीब तथा बढ़े हुए थे ।जो बैग में बहुत सारी अपनी छपी, गैर छपी कविताएं लिए घूम रहा था और द्विवेदी जी से मिलना चाहता था। उन्होंने उससे बात करना तो  दरकिनार, दूर से ही देखकर भगा दिया कि पहले अपना हुलिया सुधारो तब मेरे पास आना ।अब उसे लाने वाले महाशय तथा उस तथा कथित कवि दोनों की हालत देखने लायक थी।

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