नेहरू जी के स्वतंत्रता संग्राम पर किए गए वलिदानों और प्रयासों को कोई भी नकार नहीं सकता। वे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। उस समय एक से एक भयावह समस्याएं मुंह बाए खड़ी थीं। गरीबी ,बेरोजगारी,देश का पिछड़ापन , आपसी विरोध, भितरघात … क्या-क्या नहीं था ! देश के महानायक के तौर पर उस समय जैसा भी उनसे संभव था, उन्होंने किया और अपने देश को प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ाया । परिस्थितिवश गलतियां सबसे होती हैं । उनसे भी कुछ हुई होंगी। इसे नकारा नहीं जा सकता ।
उन्होंने अपने जन्मदिन 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाए जाने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें सचमुच अपने देश की भावी पीढ़ी से गहरा लगाव था।
अब अगली बात बच्चों पर , वर्तमान में जिनका बचपन ही बचपन जैसा नहीं रहा । डेढ़ साल का होते-होते उसे जबरदस्ती लिटिल बेबी स्कूल्स में भेज दिया जाता है। ढाई- तीन साल का होते-होते अपने वजन से ज्यादा वजनी बस्ता कंधों और पीठ पर लादे मोंटेसरी स्कूलों की ओर वो चल पड़ता है। आधुनिक शिक्षा का उस पर इतना दबाव है कि वह समझ ही नहीं पाता कि उसका बचपन कब आया और कब निकल गया । इन परिस्थितियों में भी मेरी ओर से देश के सभी नौनिहालों और भावी कर्णधारों को बाल दिवस की बहुत-बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं एवं उनके अभिभावकों के प्रति दो शब्द-
“बच्चों का बचपन मत छीनो, कुछ तो सुख से जी लेने दो।
मत अभिशापित करो बालपन,शैशव का रस पी लेने दो।।”
Trending Now
नेहरू जी , बाल दिवस और आज का परिदृश्यलेखक : शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी
👁 18.3K views






