रिपोर्ट नर्सिंग मौर्य
असोथर, फतेहपुर। होली का त्योहार नजदीक आते ही असोथर क्षेत्र में पारंपरिक तैयारियों की रौनक साफ दिखाई देने लगी है। गांवों और कस्बों की छतों व आंगनों में धूप में सूखते आलू, साबूदाना और चावल के देसी पापड़ त्योहार की दस्तक दे रहे हैं।
ब्लॉक क्षेत्र के असोथर, ललौली और आसपास के गांवों में महिलाएं समूह बनाकर पापड़ तैयार कर रही हैं। सुबह से दोपहर तक चलने वाली इस सामूहिक तैयारी में उत्साह, हंसी-मजाक और अपनापन साफ झलकता है।
परंपरा और स्वाद का संगम
महिलाओं ने बताया कि पापड़ बनाने की प्रक्रिया करीब 15 दिन पहले शुरू हो जाती है। उबले आलू, भीगे साबूदाने और चावल के आटे का मिश्रण तैयार कर उसमें जीरा, काली मिर्च और नमक मिलाया जाता है। इसके बाद पापड़ बेलकर तीन से चार दिन तक तेज धूप में सुखाया जाता है।
घर में बने ये पापड़ न सिर्फ स्वाद में बेहतर होते हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी सुरक्षित माने जाते हैं क्योंकि इनमें किसी प्रकार का प्रिजर्वेटिव नहीं मिलाया जाता। होली के दिन इन्हें तलकर या भूनकर मेहमानों को परोसा जाता है।
मेलजोल की मिसाल
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि यह परंपरा केवल खानपान तक सीमित नहीं, बल्कि आपसी सहयोग और सामाजिक एकता का प्रतीक है। पहले संयुक्त परिवारों में बड़े पैमाने पर पापड़ बनाए जाते थे, आज भी त्योहार के बहाने वही सामूहिकता देखने को मिल रही है। होली से पहले असोथर क्षेत्र में पापड़ बनाने की यह परंपरा ग्रामीण संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश कर रही है—जहां स्वाद के साथ रिश्तों की मिठास भी तैयार होती है।








