फतेहपुर शहर के महिला डिग्री कालेज के निकट मन्दिर चल रही भव्य श्रीमद्भागवत कथा में युवा कथावाचक ने शीलू रामायणी ने अपने मधुर वाणी से महाभरत के प्रसंग बताते हुए कहा कि किस प्रकार से भगवान अपने भक्तों पर कृपा करते है साथ ही बहुत सुंदर सा प्रसंग सुनाया जिसमें भगवान कृष्ण समस्त पांडवो के साथ कुरुक्षेत्र की यात्रा की जहां पर भीष्म पितामह बाण के सरसैया पर लेटे हैं शरीर के एक एक जगह पर बाण लगे है बड़ी पीड़ा हो रही है जब प्रभु सभी के साथ पहुंचे तो पितामह के नैन सजल हो गए प्रभु को प्रणाम किया और युधिष्ठिर के पूछने पर धर्म का उपदेश दिया पितामह ने दानधर्मान राजधर्मान मोक्षधर्मान विभागसह। स्त्रीधर्मान भागवतधर्मान समा स व्यास योग्यतः ।। जिसमें स्पष्ट शब्दो में बताया कि जीव को जीवन में जो धन धर्म युक्त कमाया हो उसका 10/ दान किया जाए साथ ही राजा का धर्म है कि ओ अपनी प्रजा को पुत्र की भाती प्रेम करे। चारों पुरुषअर्थ के अनुसार धन कमाए और उसी के अनुसार उस व्यक्ति का उद्धार होता है जिसे स्तुति स्मृति में मोक्ष कहा जाता है। स्त्री का धर्म है अपने पति के अन्यत्र किसी पर पुरुष को भी न देखे यदि देखे तो उसे अपने पुत्र या भाई की नजर से ऐसी परायण स्त्री को ही सती कहा जाता है। भगवान के द्वारा उपदेश दिए गए शब्दों को ही भागवत कहते है। ये सब उपदेश दे ही रहे थे कि उत्तरायण का समय आ गया तब भीष्म ने अपने मन और इंद्रियों को संयमित करके भगवान के चरणों में लगाया और भगवान का दर्शन करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए। इस प्रसंग से हमे शिक्षा मिलती है कि जीवन किसी भी तरह से जिए पर अंतिम समय में भगवान का ही चिंतन रहे। आयोजित कथा के मुख्य आयोजक राजू सोनी व श्याम बाबू मौर्य ने बताया कि इस मंदिर में पूरे वर्ष समय समय पर धार्मिक आयोजन किये जाते है। इस बार भागवत कथा का भव्य आयोजन किया गया है।
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जीवन किसी भी तरह से जिए पर अंतिम समय में भगवान का ही चिंतन रहे – शीलू रामायणी कथावाचक






