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बुंदेलखंड राष्ट्र समिति  ने रिकॉर्ड 50 वीं बार खून से पत्र लिखकर बुंदेलखंड राज्य की माँग जंतर–मंतर पर राष्ट्रीय राज्य पुनर्गठन महा धरना

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नई दिल्ली, 25 दिसंबर :
अटल बिहारी वाजपेयी जयंती के अवसर पर जंतर–मंतर पर आयोजित राष्ट्रीय राज्य पुनर्गठन महाधरना में बुंदेलखंड राष्ट्र समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पर्यावरण पहरूवा प्रवीण पांडेय ‘बुंदेलखंडी’ ने रिकॉर्ड 50वीं बार अपने खून से पत्र लिखकर पृथक बुंदेलखंड राज्य की माँग उठाई।
महाधरना में देश के विभिन्न पिछड़े क्षेत्रों—पूर्वांचल, बुंदेलखंड, विदर्भ, मराठवाड़ा, सीमांचल–कोसी, मिथिला और महाकौशल—के प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से कहा कि वर्तमान राज्य संरचना के साथ ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता।
प्रवीण पांडेय ‘बुंदेलखंडी’ ने कहा कि बुंदेलखंड राज्य की माँग कोई भावनात्मक विषय नहीं, बल्कि संतुलित राष्ट्रीय विकास से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न है। उन्होंने कहा कि 1956 के राज्य पुनर्गठन में बुंदेलखंड के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ, जिसे अब सुधारना आवश्यक है।
बुंदेलखंड राष्ट्र समिति के संगठन महामंत्री यज्ञेश गुप्ता ने कहा कि क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त किए बिना राष्ट्रीय विकास संभव नहीं है और राज्य पुनर्गठन को लेकर केंद्र सरकार को समयबद्ध एवं ठोस नीति घोषित करनी चाहिए।
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चन्द्रभान राय ने कहा कि बुंदेलखंड के युवा, किसान और श्रमिक लंबे समय से उपेक्षा और पलायन का सामना कर रहे हैं तथा पृथक राज्य ही उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान है।
इस अवसर पर पूर्वांचल राज्य जनांदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुज राही ‘हिन्दुस्तानी’ ने कहा कि सरकार विकसित भारत 2047 की बात कर रही है, लेकिन उसका स्पष्ट रोडमैप सार्वजनिक नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि व्यापक राष्ट्रीय राज्य पुनर्गठन के बिना विकसित भारत संभव नहीं है।
बुंदेलखंड उत्सव समिति के उपाध्यक्ष राजन धमेरिया ने कहा कि बुंदेलखंड को 1956 में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बाँट दिए जाने के बाद यह क्षेत्र लगातार उपेक्षित रहा है।
महाधरना में संजय अग्रवाल, अजीत तिवारी, दीपक साहू, ज्ञानेश्वर कुशवाहा, शिवम् झा, सचिन ‘झांसीया’, हर्षित खन्ना, रोहित यादव, उत्कर्ष त्रिवेदी सहित सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ता और पदाधिकारी मौजूद रहे।
महाधरना में शामिल संगठनों ने केंद्र सरकार से पिछड़े क्षेत्रों का वैज्ञानिक पुनर्मूल्यांकन, व्यापक राष्ट्रीय राज्य पुनर्गठन, तथा पूर्वांचल, बुंदेलखंड, विदर्भ, मराठवाड़ा, मिथिला, सीमांचल–कोसी और हरित प्रदेश को अलग राज्यों के रूप में गठित करने की माँग की।

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