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अक्षय तृतीया एवं भगवान परशुराम जयंती विशेष: धर्म, पराक्रम और तपस्या का अद्वितीय संगम

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लेखक: शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी

19 अप्रैल 2026 को पावन पर्व अक्षय तृतीया के साथ भगवान भगवान परशुराम की जयंती मनाई जा रही है। यह दिन सनातन धर्म में अत्यंत शुभ और अक्षय फल देने वाला माना जाता है।

शास्त्रों में जन्म का उल्लेख

श्रीमद् भागवत पुराण में भगवान परशुराम के जन्म का वर्णन इस प्रकार मिलता है—

“वैशाखस्य सिते पक्षे, तृतीयायां पुनर्वसौ।
रेणुकाया: गर्भात्, अवतीर्णो स्वयं विभु:।।“

इसके अलावा भविष्य पुराण, स्कंद पुराण और महाभारत में भी उनके जीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है।

जन्म और परिवार

भगवान परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था। वे महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे तथा महर्षि ऋचीक के पौत्र थे।
उन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है।

सहस्रार्जुन से संघर्ष

हैहय वंशी राजा कार्तवीर्य अर्जुन अत्यंत पराक्रमी था। उसने अपने बल के अहंकार में आकर महर्षि जमदग्नि के आश्रम को नष्ट कर दिया और उनकी हत्या कर दी।
इस अन्याय के विरुद्ध भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को अत्याचारी राजाओं से मुक्त करने का संकल्प लिया।

तपस्या और त्याग

संपूर्ण पृथ्वी जीतने के बाद उन्होंने उसे महर्षि कश्यप को दान कर दिया और स्वयं महेंद्र पर्वत पर तपस्या में लीन हो गए। मान्यता है कि वे आज भी वहीं तप कर रहे हैं।

भौगोलिक और धार्मिक योगदान

कथाओं के अनुसार—

उन्होंने समुद्र से भूमि निकालकर केरल का निर्माण किया ब्रह्मपुत्र, गोमती जैसी नदियों को प्रवाहित किया

नर्मदा तट पर स्थित महेश्वर प्राचीन महिष्मती नगरी थी


राम और महाभारत काल से संबंध

भगवान परशुराम ने राम को सीता स्वयंवर के बाद दिव्य धनुष प्रदान किया।
वहीं महाभारत काल में उन्होंने भीष्म, कर्ण और द्रोण जैसे महान योद्धाओं को शिक्षा दी।

चिरंजीवी परंपरा में स्थान

शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम आठ चिरंजीवियों में से एक हैं—

“अश्वत्थामा बलिर्व्यासो, हनुमानंश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः।।
मार्कंडेयमथाष्टकम्।।“

साहित्य में योगदान

आधुनिक साहित्यकार के. एम. मुंशी ने भी इस कालखंड पर उपन्यास लिखे हैं। स्वयं लेखक द्वारा ‘भार्गव’ महाकाव्य और ‘परशुराम की आत्मकथा’ जैसे ग्रंथ भी चर्चित हैं।

निष्कर्ष

भगवान परशुराम का जीवन केवल पराक्रम की गाथा नहीं, बल्कि धर्म, न्याय और तपस्या का आदर्श है।

“परशुराम की जय कहना ही, आज नहीं पर्याप्त।
अन्यायों, अत्याचारों को मेटो, हैं जो व्याप्त।।“

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