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फतेहपुर जनपद और उसकी रामलीलाएं लेखक – शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी (पूर्व राम एवं परशुराम अभिनेता तथा  ‘परशुराम की आत्मकथा’ एवं ‘सुभग सीता स्वयंवर’ नामक पुस्तकों के प्रसिद्ध रचनाकार)

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यह जनपद जिस प्रकार से साहित्य, वीरता ,वलिदान इत्यादि में सदैव आगे रहा। उसी तरह यहां की रामलीलाएं भी अपना एक विशेष महत्व रखती हैं। इन रामलीलाओं का इतिहास संजोकर के नहीं रखा गया इसलिए इनके प्रमाण नहीं दिए जा सकते कि यह कितनी पुरानी लीलाएं हैं ।इनमें कुछ तो ऐसी लीलाएं हैं जो कि 500 बरस से भी पहले की हैं। बनारस के रामनगर की लीलाओं से भी पूर्व की हैं लेकिन उनके कागजात आज मौजूद नहीं हैं। खजुआ, कुंवरपुर ,असोथर, हसवा, किशनपुर , असनी, खागा ,हथगाम ,बिंदकी इत्यादि तथा स्वयं फतेहपुर नगर की रामलीला अपना विशेष महत्व रखती है।
इसमें एक प्रश्न यह उठना स्वाभाविक है कि जब रामचरितमानस का इतना प्रचार नहीं हुआ था तब रामलीलाओं का स्वरूप क्या रहा होगा ? यह प्रश्न मैंने भी कई जगह उठाया है और इसका उत्तर यह पाया है कि यह लीलाएं तब वाल्मीकि रामायण का आधार लेकर संपन्न होती थीं ।महाभारत में भी इस प्रकार का उल्लेख आया है कि वहां इस तरह के अभिनय श्री कृष्ण भगवान के काल में हुआ करते थे । वाल्मीकि रामायण के अलावा  हनुमन्नाटक और  महाकवि भास तथा भवभूति इत्यादि के राम कथा से संबंधित कई  प्रसिद्ध नाटक हैं जो पहले से खेले जाते रहे हैं ।यह नाटक भी दूसरी शताब्दी से चौथी शताब्दी के बीच के हैं ।अतः रामलीला की प्राचीनता निर्विवाद है।
इन लीलाओं का आरंभ मुगल काल के समय और इसके भी पहले संत महात्माओं ने हिंदू समाज को एकत्र करने के लिए, जागरूक करने के लिए और उनका आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए आरंभ किया था। उस समय की लीलाओं में लगभग सारे के सारे पात्र संत महात्मा ही हुआ करते थे ।केवल राम और लक्ष्मण  ब्राह्मणों के गृहस्थ परिवारों से 7,8 वर्ष से लेकर के  12, 13 वर्ष के बालकों को बनाया जाता था। इसके लिए एक प्राचीन कथा भी प्रसिद्ध है कि जब भगवान राम परलोक गमन करने लगे तो हनुमान जी ने उनसे पूछा कि हे प्रभो,मुझे  अब आपके इस स्वरूप के दर्शन किस प्रकार से  प्राप्त हुआ करेंगे। तब उन्होंने उत्तर दिया- किसी ब्राह्मण बालक को अपने सामने मुकुट पहनाकर बिठला लेना उसी में  तुम्हें मेरे दर्शन प्राप्त हुआ करेंगे । इसीलिए रामलीलाओं और राम कथाओं में  बजरंगबली हनुमान जी की उपस्थिति अनिवार्य रूप से ही मानी जाती है। यह कथा रामलीला के आरंभ की  पूर्व पीठिका तथा सर्वप्रथम रूपरेखा के स्वरूप में ही है और इसी मान्यता के आधार पर आज भी राम ,लक्ष्मण, सीता के पात्र ब्राह्मणों के बालक ही बनाए जाते हैं ।परशुराम का अभिनेता भी ब्राह्मण ही होता है क्योंकि उसे राम और लक्ष्मण को  प्रणाम या चरण स्पर्श करना पड़ता है। आज इस स्वरूप में कुछ प्रतिष्ठित मंदिरों के महंत भी प्रस्तुत होने लगे हैं । उन्हें राम और लक्ष्मण   के अभिनेता संत – महात्मा समझ करके ही प्रणाम निवेदित करते हैं।
   यहां की कुछ रामलीलाओं का इतिहास 150, 200 साल के आसपास का लोगों की जानकारी में है। शेष सब किम्वदंतियों के गर्त में समा कर रह गया। किंवदंतियां जो कभी झूठी नहीं होती लेकिन प्रमाण नहीं प्रस्तुत कर सकतीं। 
   मेरे देखते ही देखते कितनी प्राचीन लीलाएं समाप्त हो गईं ।आज बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने उन लीलाओं को देखा होगा। बिंदकी में कटरा मोहल्ला से लेकर विभिन्न स्थानों में संपन्न होती हुई बड़ी ही शानदार प्राचीन लीला थी ।लेकिन अचानक 1990 के दशक में जड़ से समाप्त हो गई ।कहने को फाटक बाजार से पश्चिम दिशा की ओर जाने वाला लंका रोड रह गया। लेकिन लीला नहीं रह गई। 45 साल पहले तक बहुत ही शानदार तरीके से एक ऊंचे टीले पर  शीतला मंदिर के पूर्व की ओर रावण वध का कार्यक्रम होता था जो न जाने कब से चला आ रहा था ।महजनी गली से सज कर सारी सवारियां आती थीं । इसी मैदान में रावण वध का कार्यक्रम होता था। अचानक एक बार कब्रों का हो हल्ला हुआ और वह पूरी की पूरी रामलीला समाप्त हो गई जो बिंदकी के विभिन्न स्थानों को समाहित किए हुए संपूर्ण रामचरितमानस का आधार लेकर लगभग एक माह चलती थी। उसकी समाप्ति के बाद ही  बैलाही बाजार में रावण वध का कार्यक्रम दशहरे के दिन आयोजित होना आरंभ हुआ। मीरखपुर मोहल्ले में भी कई लोग मिलकर के तीन दिन की रामलीला – जिसमें पहले दिन निकासी ,दूसरे दिन रावण वध और तीसरे दिन भरत मिलाप होता था चलाते रहे। कई वर्षों तक वह चलती रही। बाद में वह भी समाप्त हो गयी ।कटरा मुहल्ले के मूला देवी जूनियर हाई स्कूल में तीन दिन की रामलीला जिसमें रामजन्म, ताड़का वध, फुलवारी लीला और धनुष भंग का आयोजन होता था। बहुत दिनों चलता रहा ,वह भी समाप्त हो गया ।फतेहपुर नगर में मोटे महादेवन की रामलीला समाप्त हो गई। कालिका कुटी की रामलीला समाप्त हो गई। बचने को अब दो ही रामलीलाएं प्राचीन बचीं एक तुराब अली के पुरवा वाली शीतला कुटी की रामलीला ,दूसरी  ज्वालागंज  की महानंद रामलीला । लीलाओं की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं रह गई । महानंद रामलीला कमेटी जो लीला बड़े प्रयास पूर्वक करा रही है। इसमें धनुष भंग के अलावा शायद ही 40-50 लोग दर्शक के रूप में जुड़ पाते हों।
   कुछ नई एक दिवसीय धनुष भंग लीलाओं का आयोजन आरंभ हुआ है लेकिन उनमें वह भक्ति भाव नहीं है। रामलीला के स्थान में हिजड़े और यहां तक की महिला नृत्य कलाकारों का भी समावेश हो गया है । जहां फूहड़ता  और नंगनाच चरम पर है । रामलीला के नाम पर अभिनेताओं को बोलने का मौका ही नहीं मिलता। रावण वाणसुर संवाद धीरे-धीरे समाप्ति पर है।
    एक बार तो भिटौरा पक्के घाट के धनुष भंग में बिना बुलाए तीन-चार हिजड़े जबरदस्ती आ गए और उन्होंने ऐसा समां बांधा कि रामलीला पीछे पड़ गई। सारे दर्शक उन्हें ही धुआंधार पैसे लुटाने लगे ।वे जबरदस्ती डांस पर डांस करने लगे ।यहीं बांदा से आकर बसंत टॉकीज के पास फतेहपुर का रहने वाला डांसर पायल गुड़िया कंपटीशन में लग गया । आपस में झगड़ा होने लगा और बाद में दर्शक पर्दे के बाहर का अभिनय देखने के बजाय पर्दे के पीछे की हिजड़ों और पायल गुड़िया की लड़ाई देखने में व्यस्त हो गए जो इतने वीभत्स रूप में पहुंची कि उसे कहना अश्लीलता ही होगा। तब संभवतः उस बार वहां न रावण- बाणासुर  संवाद हुआ,न जनक विलाप हुआ। सीधा परशुराम जी महेंद्राचल पर आने के लिए तैयार होकर बैठ गए। लेकिन उन्हें भी मंच पर  आना बहुत ही कठिन  हो गया।
   कुल मिलाकर नयी रामलीलाएं जिधर कदम बढ़ा रही हैं ,वहां और सब कुछ तो है लेकिन रामलीला नहीं है,भक्ति भाव नहीं है, श्रद्धा नहीं है । मैं अपने बचपन की बात कहता हूं ।लगभग 50 साल पहले तक राम और लक्ष्मण शुक्रोदय होने के पूर्व तक ही अभिनय कर पाते थे। कहने का तात्पर्य ज्यादा से ज्यादा 12 या 13 वर्ष तक के बालक ही राम और लक्ष्मण की भूमिका में उतारे जाते थे। उनका सम्मान वास्तविक राम लक्ष्मण के समान ही उस समय होता था। पैसे का तो कोई लालच था ही नहीं ।आरती के पैसे भी कमेटी वाले ही ले जाते थे । जो प्रसन्नता पूर्वक उन्हें दे दिया  जाता था वे उतने से ही संतुष्ट थे। मर्यादाओं का तो इतना पालन था कि कोई भी अभिनेता बीड़ी -सिगरेट तक मंच के पीछे नहीं पी सकता था । आज तो गांजा और भांग छोड़िए शराब तक पीकर के अभिनय में उतरने वाले बहुत से अभिनेता मिल जाएंगे । 3000₹ से 5000₹ के बीच में केवल लक्ष्मण परशुराम संवाद के लिए लक्ष्मण जी और परशुराम जी ले रहे हैं। संवाद इतने विश्रंखल हैं कि प्रत्येक अभिनेता रामचरित से बाहर आकर ही अपने अभिनय का कमाल दिखाना चाहता है।
  तुलसीदास जी, केशव दासजी, राम रसायन, रघुराज सिंह,राधेश्याम रामायण, रूप राम त्रिपाठी, सुशील जी के इत्यादि के रामलीला से संबंधित छंदों को तथा मानस पीयूष और गूढ़ार्थ चंद्रिका इत्यादि को छोड़कर श्रीमद्भागवत और श्रीमद्भगवत गीता इत्यादि से ही अपने प्रवचन चालू कर देते हैं। वर्तमान में अधिकतर लक्ष्मण एवं परशुराम के अभिनेता श्रीमद् भागवत के प्रवक्ता एवं व्यास का कार्य करने वाले हैं इसलिए भी  रामलीला एक कोने धरी रह जाती है ।लक्ष्मण परशुराम संवाद में रामचरितमानस की पूरी चौपाई तक नहींपढ़ी जातीं। अपनी विद्वत्ता दिखाने के नाम पर आपस में झगड़ा करने तथा अपशब्दों तक का प्रयोग करने में पीछे नहीं रहते।
  एक बार तो एक बहुत प्रसिद्ध परशुराम अभिनेता जो अफीम के भयानक  प्रेमी थे ने लक्ष्मण अभिनेता की पीठ में गुस्से में आकर कई बार फरसे की चोट कर दी। फरसे में  तेज धार थी ।लक्ष्मण बना छोटा सा बालक घायल  होकर लहू लुहान हो गया। बात पुलिस चौकी   तक पहुंच गई । यह तो कहिए उस बालक ने ही उन परशुराम जी को क्षमा कर दिया । वरना जेल में बंद हो जाने पर और  विशेष रूप से नियमित अफीम न मिल पाने पर उनकी मृत्यु अत्यंत शीघ्र सुनिश्चित  थी ।
   निष्कर्ष स्वरूप  यह कहा जा सकता है कि इन प्राचीन एवं अर्वाचीन रामलीलाओं का उज्ज्वल भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि रामलीला मंडलियां, आयोजक,अभिनेता और समाज इन्हें व्यावसायिकता से ऊपर उठाकर श्रद्धा और भक्ति की ओर ले जाए। रुपए कमाने की होड़ में इनका स्तर गिराने का प्रयास न किया जाए। रामलीला को रामलीला ही बना रहने दिया जाए । इन्हें  फूहड़ता,भंड़ैती या अश्लीलता के गर्त में धकेलने का प्रयास न किया जाए कि ये अपने लक्ष्य से ही विमुख प्रतीत हों । अभिनेता अपनी अभिनय कला के साथ ही साथ अपने चरित्र को भी प्रयत्न पूर्वक ठीक-ठाक रखने का प्रयास करें जिससे समाज में उनकी छवि ऐसी न जाए कि लोग उन पर नाक भौं सिकोड़ें।

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