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फतेहपुर सिंचाई विभाग में बड़ा खेल! टाइपिंग नहीं आती, फिर भी बन गए बाबू, अब जांच की आंच तेज मृतक आश्रित नियुक्तियों में प्रमोशन पर सवाल, दोबारा परीक्षा की मांग से विभाग में हड़कंप

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फतेहपुर जिले के सिंचाई खंड निचली गंगा नहर विभाग में कथित तौर पर बड़ा खेल सामने आने के बाद विभागीय हलकों में हड़कंप मचा हुआ है। गोपनीय शिकायत में आरोप लगाया गया है कि करीब दस ऐसे कर्मचारियों को नियमों को दरकिनार कर लिपिक (बाबू) पद पर प्रमोट कर दिया गया, जिन्हें कंप्यूटर टाइपिंग तो दूर माउस चलाना तक ठीक से नहीं आता। अब इन कर्मचारियों की दोबारा परीक्षा कानपुर, प्रयागराज या लखनऊ की स्वतंत्र समिति से कराए जाने की मांग उठ रही है।

सूत्रों के मुताबिक पिछले वर्षों में मृतक आश्रित कोटे के तहत एलजीसी में 6 और सिंचाई खंड में 5 कर्मचारियों की चतुर्थ श्रेणी पद पर नियुक्ति हुई थी। आरोप है कि बाद में इन कर्मचारियों को बाबू बनाने के लिए कथित सेटिंग का खेल शुरू हुआ। बताया जा रहा है कि आईटीआई में आयोजित टंकण और कंप्यूटर परीक्षा में कई कर्मचारी फेल हो गए थे, लेकिन बाद में उन्हें पास घोषित कर दिया गया।

सूत्रों का दावा है कि कथित तौर पर प्रति कर्मचारी दो-दो लाख रुपये लेकर परीक्षा पास कराई गई और उसके बाद सभी को लिपिक पद पर पदोन्नत कर दिया गया। विभागीय कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि यदि इनकी दोबारा निष्पक्ष परीक्षा कराई जाए तो अधिकांश कर्मचारी अनुत्तीर्ण हो सकते हैं।

मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब कानपुर डिवीजन में इसी तरह के तीन कर्मचारियों को दूसरी कार्यदायी संस्था की टंकण परीक्षा में फेल पाए जाने पर वापस उनके मूल पद पर भेज दिया गया। इसी कार्रवाई के बाद फतेहपुर में भी विभागीय हलचल तेज हो गई है।

सूत्रों के अनुसार जिले के कई भाजपा नेताओं ने भी इस पूरे मामले की शिकायत शासन और प्रशासन से की है। शिकायत के बाद विभागीय अधिकारियों में बेचैनी बढ़ गई है। चर्चा है कि यदि जांच आगे बढ़ी तो कई कर्मचारियों की पदोन्नति रद्द हो सकती है और उन्हें दोबारा चतुर्थ श्रेणी पद पर भेजा जा सकता है।

इतना ही नहीं, सूत्रों का यह भी कहना है कि जिन कर्मचारियों ने लिपिक संवर्ग का वेतनमान लिया है, उनसे रिकवरी की कार्रवाई भी हो सकती है। गोपनीय शिकायत के बाद अब अफसरों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है और कई अधिकारियों की कलम फंसती नजर आ रही है।

हालांकि अभी तक सिंचाई विभाग की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन आरोपों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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