Homeउत्तर प्रदेशफतेहपुरफतेहपुर जनपद -  एक विहंगावलोकन लेखक : शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी

फतेहपुर जनपद –  एक विहंगावलोकन लेखक : शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी

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  गंगा और यमुना के बीच बसा यह जिला प्राचीन काल से अंतर्वेद के नाम से प्रसिद्ध  रहा है। वैदिक काल से इसे पुण्य क्षेत्र की संज्ञा प्राप्त है। जो आज भी प्रत्येक पूजा- पाठ के समय संकल्प में दुहराया जाता है ‌।पुराण काल में यह जनपद कन्नौज राज्य के अंतर्गत आता था। बाद में बौद्ध काल में 10 महाजनपदों में से वत्स जनपद के अंतर्गत इसकी गणना होती रही।  यह जनपद  अनेक महान ऋषियों-मुनियों  तथा महापुरुषों की जन्म भूमि एवं कर्मभूमि भी है। इसके परिचय में इस जनपद के बड़े ही शानदार और जानदार मेरे परम प्रिय कवि आचार्य विष्णु फतेहपुरी का एक छंद देना चाहूंगा – “जाके उत्तर में माई गंग बहैं,दिसि दक्षिण में यम की भगिनी।
है पूरब तीरथराज प्रयाग, औ पश्चिम कर्ण को धाम धनी।।
असनी के कुमारन कै गिनती, नहिं शेषहुनाग से जात गिनी।
तपोभूमि यही भृगुनाथ की है, जिन विष्णु की छाती पै लात हनी।। “
यहां पर गुप्तकालीन मंदिरों से लेकर उस काल खंड के सिक्के इत्यादि प्राप्त होने से उस समय भी इसकी उपस्थिति अनुभव की जा सकती है। तेंदुली, कोरारी, धमिना, ठिठौरा, असनी  इत्यादि के ईटों से निर्मित गुप्तकालीन मंदिर ,रेंय से प्राप्त भगवान विष्णु की मूर्ति तथा मंझलिगों स्थित एक मुखी शिवलिंग, इसकी प्राचीनता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। चीनी यात्री ह्वेनसॉन्ग का भी असनी में आना विभिन्न ग्रंथों के माध्यम से प्रमाणित हो चुका है। सांखा  में बुद्ध भगवान की विशाल प्रतिमा बौद्ध काल के अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान के रूप में इसे प्रतिस्थापित करती है।
बाद में समय के करवट बदलते विभिन्न राजवंशों ने इस पर शासन किया । यहां पर गौतम क्षत्रियों का  भी बहुत काल तक वर्चस्व रहा जिसके कारण इसका गौतमाना नाम भी शामिल है। खजुआ का प्राचीन नाम फतुहाबाद था। जिसके नाम से ही फतूहाबादी शुक्ल आज भी प्रसिद्ध हैं। यहां के प्राचीन ग्राम भी अनेकानेक प्राचीन महापुरुषों के नाम पर स्थापित किए गए हैं और उनका संबंध भी उन लोगों से ही जोड़ा जाता है जैसे अश्वत्थामा के नाम से असोथर महाराज मोरध्वज के नाम से मोरांव, महर्षि भृगु के नाम से भिटौरा जहां उत्तर वाहिनी गंगा जी प्रवाहित हैं, भगवान राम कालीन महाराज  वेणु के नाम से बिंदकी , बलराम की ससुराल रेवत के नाम से रेंय, महाराज  हंसध्वज के नाम से हसवा  इत्यादि । बाबर से लेकर औरंगजेब तक यह क्षेत्र मुगलों के अधीन रहा।
   इसका फतेहपुर नाम रिंद नदी पर केसर  घोल – घोलकर पुल बंधवाने वाले, जिनके लिए यह प्रसिद्ध है – “कितौ रिंद रिन्दै रहिहैं,कितौ फतेहचंदै रहिहैं।” जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई का भी भरपूर सहयोग किया राजा फतेह  चंद के नाम से प्रसिद्ध है । कुछ लोगों का यह भी कथन है की अठगढ़िया राजा सीतानंद को जौनपुर के नवाब इब्राहिम शाह के द्वारा फतेह किए जाने पर इसका नाम फतेहपुर पड़ा है । वहीं पर कुछ लोग इसे फतेह मंद खान के द्वारा भी नामकरण किया जाना मानते हैं।
   1736 तक यह क्षेत्र अवध के नवाबों के अधीन रहा। बाद में 1750 तक मराठा राज्य के आधिपत्य में , तत्पश्चात  1753 तक पठानों के और पुनः 1764 तक अवध के नवाबों के आधिपत्य में  रहा। इसी वर्ष अवध के  तत्कालीन नवाब ने ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ संधि स्वरूप उसे सौंप दिया लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1774 में  इसे पुनः तत्कालीन अवध के नवाब वजीर खान  को दे दिया और 1801 में अवध के नवाबों द्वारा इसे पुनः अंग्रेज सरकार के हाथों सौंप दिया गया।
1803 से 1824 तक इलाहाबाद में इससे संबंधित जज मजिस्ट्रेटी का काम चला । 1814 में भिटौरा में ज्वाइंट मजिस्ट्रेटी कायम हुई लेकिन अनेक कठिनाइयों के कारण 1825 में ज्वाइंट मजिस्ट्रेटी फतेहपुर आ गई। भिटौरा के बलखंडी घाट के आसपास  जो कुछ पुराने ईटों के खंडहर वगैरा मिलते हैं, वह इसी कालखंड के हैं । ओम घाट पर पुराने समय की जो कोठरी 50 साल पहले तक दिखाई पड़ती थी वह भी उसी काल की है। अब उसे नया स्वरूप दे दिया गया है। 1814 से ही इसे  अलग जिला बनाने की मांग उठने लगी थी। जो 31 अगस्त 1826 में कुछ लोगों के कथनानुसार (10 नवंबर 1826) तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड एम. हार्स्ट ने कानपुर और इलाहाबाद के 13 परगनों को जोड़कर इस जिले को फतेहपुर जिले का नाम दिया और तभी से कानपुर और इलाहाबाद के बीच यह जिला प्रकाश में आया।
यह जनपद 57 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में विस्तृत तीन तहसीलों, 13 ब्लॉक और 6 विधानसभाओं से संयुक्त है । 2011 की जनगणना के अनुसार 2632733 इसकी जनसंख्या है। इसकी 87.77 प्रतिशत आबादी गांव में तथा 12.3  प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करती है । इस जिले का लिंगानुपात 1000 और 901 है। अर्थात 1000 लड़कों में 901 लड़कियां। इसकी साक्षरता दर 58.6% है । इसके  दर्शनीय पर्यटन स्थलों  एवं ऐतिहासिक स्थलों में खजुआ की बावनी इमली,बाग बादशाही, पैवेलियन, हथगाम में राजा जयचंद  का किला, जहानाबाद की सोरहीं और राजमहल, असोथर का किला, सांखा ग्राम में बुद्ध भगवान का मंदिर, शिवराजपुर और असनी के प्राचीन मंदिर, कोराईं ग्राम के उत्तरी छोर पर पड़ने वाले प्राचीन मंदिर और कुएं, हसवा का रानी तालाब ,आबूनगर फतेहपुर में आबूखां का मकबरा के नाम से प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर जो आज विवाद का विषय हो गया है, धाता की ओर जाने वाले मार्ग में अंग्रेजों का बनवाया हुआ तीन खंड का ससुर खदेरी नदी पर निर्मित पुल  जिसके नीचे ससुरखदेरी  नदी ,ऊपर नहर प्रवाहित हो रही है तथा अगल-बगल कोठारियां बनी हुई हैं और उनके ऊपर दोनों ओर आने – जाने का चौड़ा पक्का रास्ता बना हुआ है, विशेष रूप से देखने योग्य हैं । यहां के प्रसिद्ध महापुरुषों में जोधा सिंह अटैया, दरियाव सिंह, भगवत राय खींची,असनी के नरहरि बंदीजन, लाला भगवान दीन, बाबू वंश गोपाल, गणेश शंकर  विद्यार्थी, सोहनलाल द्विवेदी, डॉ असगर वजाहत इत्यादि हैं। यहां की पहचान हिंदू, मुस्लिम ,सिख और इसाई सभी का आपस में प्रेम से रहना और आज तक  कभी भी किसी भी प्रकार का  धार्मिक दंगा न होना ही है । यहां लोग यहां के लोग बहुत हंसमुख तथा जिंदा दिल इंसान हैं । लेकिन यहां के निवासियों में जगह-जगह शिव मंदिरों के होने के कारण  भगवान शंकर का प्रभाव  कुछ अधिक ही है । इसीलिए  “क्षणे  रुष्टा, क्षणे तुष्टा” का गुण   इन लोगों के व्यक्तित्व में विशेष रूप से पाया जाता है । कुल मिलाकर यह जिला आज नित नूतन विकास  से प्रभावित होकर  सबसे कम से कदम मिलाकर आगे बढ़ता प्रतीत हो रहा है। पाश्चात्य सभ्यता का भी असर यहां बखूबी काम कर रहा है। इसके लिए मेरी ओर से एक ही शुभकामना है – दिन पर दिन उन्नति करे, पंथ प्रेम का थाम ।
जिला फतेहपुर, हर फतेह कर होवे सरनाम ।

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