इस बार 28 अगस्त 2026, दिन शुक्रवार को श्रावणी पूर्णिमा एवं रक्षाबंधन (राखी) का पावन पर्व है। प्राचीन काल से यह पर्व ब्राह्मणों के उपाकर्म से संबंधित रहा है। इसीलिए प्रसिद्ध था—
“विप्राणाम् श्रावणी पूर्णिमा,
क्षत्रियाणाम् विजयादशमी।
वैश्याणाम् दीपावली,
शूद्राणां च होलिकोत्सवः।।”
लेकिन अब यह बहुत पुरानी और बीती बात हो गई है। आज सभी पर्व सभी लोग आपस में मिल-जुलकर मनाते हैं।
इस दिन प्राचीन काल से सभी ब्राह्मण नियमपूर्वक किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करते थे। प्रातःकालीन संध्योपासना पूर्ण करने के बाद विविध विधि-विधान से नए यज्ञोपवीत को धारण करते और पुराने यज्ञोपवीत का विसर्जन करते थे। बाद में यजमानों को मंत्रपूर्वक रक्षा सूत्र बांधा जाता था। रक्षा सूत्र बांधने का मुख्य उद्देश्य यजमानों को स्वधर्म के प्रति जागरूक करना था। जैसा कि मंत्र का तात्पर्य भी है—
“येन बद्धो बली राजा,
दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि,
रक्षे, मा चल, मा चल।।”
वैदिक काल से रक्षाबंधन का पर्व भगवती महालक्ष्मी द्वारा रक्षासूत्र के माध्यम से अपने पति भगवान विष्णु को महाबली राजा बलि की सेवा से मुक्ति दिलाने के प्रसंग से भी स्मरण किया जाता है।
बाद में यह पर्व इतिहास में महाराणा सांगा की पत्नी महारानी कर्मावती और हुमायूं के प्रसंग से भी जोड़ दिया गया। आज यह पर्व विशेष रूप से भाई-बहनों के प्रेम और समर्पण को व्याख्यायित करता है।
ब्राह्मण समाज भी आज के दिन अपने उपाकर्म का पालन प्राचीन परंपरा के अनुसार करता आ रहा है। यह पर्व आरएसएस की विभिन्न शाखाओं और कार्यालयों में भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जिसमें देश रक्षा और सनातन हिंदू धर्म की रक्षा का भाव प्रमुख रहता है।
इस बार बहनों के लिए भाइयों की कलाई में रक्षासूत्र या राखी बांधने का शुभ मुहूर्त प्रातः 5:57 बजे से 9:50 बजे तक है।
“भैया-बहनों के लिए, अमर प्रेम का पर्व।
देश-संस्कृति के लिए ‘रक्षाबंधन’ गर्व।।”
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रक्षाबंधन पर्व–येन बद्धो बली राजा,दानवेन्द्रो महाबलः।तेन त्वां प्रतिबध्नामि,रक्षे, मा चल, मा चल।।”लेखक : शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी
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