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Lucknow News:  KGMU हॉस्टलों में नॉनवेज पर बैन, फैसले के बाद छिड़ी सियासत, जानें धर्मगुरुओं और नेताओं ने क्या कहा

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KGMU Hostel Mees Non-Veg Ban: लखनऊ के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) प्रशासन ने एक बड़ा फैसला लिया है। विश्वविद्यालय के सभी छात्रावासों की मेस और कैंटीन में अब मांसाहारी (Non-Veg) भोजन पकाने और परोसने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। चीफ प्रोवोस्ट प्रो. केके सावलानी ने कुलपति के मौखिक निर्देशों के बाद इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी किया।

क्या है पूरा मामला?

विश्वविद्यालय प्रशासन के आधिकारिक आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अब से किसी भी मेस या कैंटीन में मांसाहारी खाना न तो पकाया जाएगा और न ही परोसा जाएगा। हालांकि मेडिकल के स्टूडेंट्स की सेहत और उनके आहार का पूरा ध्यान रखते हुए यह निर्देश भी दिया गया है कि उनके भोजन में प्रोटीन की कोई कमी न हो। इसके लिए मेस संचालकों को भोजन में दाल, पनीर, सोयाबीन, दूध, दही और अन्य पौष्टिक शाकाहारी खाद्य पदार्थ शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं। बता दें KGMU में 18 हॉस्टल हैं, अब तक यहां हर हफ्ते तीन दिन मेस में नॉन-वेज बनाया जाता था।

KGMU के चीफ प्रोवोस्ट प्रो. कमल कुमार सावलानी ने नॉनवेज बैन को लेकर आधिकारिक आदेश जारी किया है।

राज्यपाल की जानकारी के बाद उठाया गया कदम

केजीएमयू के मीडिया सह प्रभारी डॉ कुमार शांतनु ने बताया कि कैंपस में लगभग 18 मेस चल रही हैं। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को सूचना मिली थी कि वहां मांसाहारी भोजन पकाया जा रहा है। इसके बाद कुलपति ने तुरंत मामले का संज्ञान लिया। डॉ शांतनु ने साफ किया कि केजीएमयू द्वारा सीधे तौर पर संचालित मेस में कभी भी नॉन-वेज नहीं बना। जो शिकायत मिली थी वह छात्रों द्वारा चलाई जा रही निजी या कोआपरेटिव मेस से जुड़ी थी। अब राज्यपाल की टिप्पणी के बाद उन सभी मेस में भी मांसाहारी भोजन बनाने पर तत्काल प्रभाव से सख्त रोक लगा दी गई है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में कोई नियम तोड़ता पाया गया तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

फैसले पर राजनेताओं ने दी अपनी प्रतिक्रिया

इस बड़े फैसले पर सियासत भी शुरू हो गई है। भाजपा सांसद दिनेश शर्मा ने कहा कि हर शिक्षण संस्थान की अपनी अलग नीतियां होती हैं और विश्वविद्यालय बहुसंख्यक छात्रों की पसंद के आधार पर ऐसे फैसले लेता है। उन्होंने कहा कि इसे बेवजह विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए।

इस मामले पर सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा कि यह आदेश तुगलकी फरमान है। जो भाजपा सांसद बंगाल में मछली-भात खाते हैं, उनके लिए कोई राज्यपाल आनंदीबेन पटेल कोई आदेश देंगी क्या? केवल यूपी में आने के बाद आपकी विचारधारा बदल जाती है।

वहीं राज्य सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि वैसे तो हर व्यक्ति स्वतंत्र है लेकिन धार्मिक स्थलों या विद्या के मंदिरों में इस तरह की सुविधाओं की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

मुस्लिम धर्मगुरुओं की राय इस मुद्दे पर बंटी

केजीएमयू के इस फैसले पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की अलग-अलग राय सामने आई है। इस्लामिक विद्वान मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। मौलाना रशीद ने ‘प्यू रिसर्च सेंटर और अन्य शोधों का हवाला देते हुए कहा कि भारत में 61 प्रतिशत से अधिक लोग मांसाहारी हैं। मेडिकल नजरिए से भी यह सेहत और इम्युनिटी के लिए काफी फायदेमंद होता है। उन्होंने कहा कि केजीएमयू प्रशासन को अपने इस फैसले पर फिर से विचार करते हुए इसे वापस लेना चाहिए, क्योंकि इससे छात्रों का फायदा नहीं, बल्कि नुकसान होगा।

दूसरी तरफ मौलाना याकूब अब्बास ने इसे विश्वविद्यालय का पूरी तरह से आंतरिक मामला बताया। उन्होंने कहा कि यह केजीएमयू प्रशासन का अपना फैसला है और इस पर किसी को भी बाहरी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि अगर कुछ छात्र नॉनवेज खाना चाहते हैं, तो वे बाहर जाकर खा सकते हैं।

सोशल मीडिया पर भी बहस

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ लोग इस फैसले के पक्ष में हैं और उनका तर्क है कि इससे मेस की व्यवस्था आसान होगी। वहीं, कई लोग इसे छात्रों की व्यक्तिगत पसंद से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि भोजन का चुनाव हर व्यक्ति का अपना अधिकार होना चाहिए और इस पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगनी चाहिए। 

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