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UP में प्रधानों को बड़ी राहत, चुनाव तक अब प्रशासक बनकर संभालेंगे पंचायतों की कमान

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UP Panchayat Election:  उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों में बड़ा प्रशासनिक बदलाव होने जा रहा है। प्रदेश की 57 हजार 695 ग्राम पंचायतों में मौजूदा ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई से समाप्त हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद गांवों की सत्ता और विकास कार्यों की जिम्मेदारी उन्हीं प्रधानों के हाथों में बनी रहेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पंचायतीराज विभाग के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत वर्तमान ग्राम प्रधानों को ही पंचायत चुनाव तक प्रशासक बनाया जाएगा। इस फैसले के बाद प्रदेश में पहली बार ग्राम पंचायतों में प्रशासक समिति का गठन होने जा रहा है। इस निर्णय को पंचायत व्यवस्था और ग्रामीण राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

26 मई से बदलेगी पंचायतों की व्यवस्था

प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 25 मई तक था और 26 मई से नई व्यवस्था लागू होने जा रही है। सामान्य परिस्थितियों में इस समय तक नए पंचायत चुनाव हो जाने चाहिए थे, लेकिन इस बार हालात अलग हैं। पंचायत चुनावों में देरी और विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों को देखते हुए सरकार ने यह बड़ा फैसला लिया है। अब मौजूदा ग्राम प्रधान ही प्रशासक के रूप में ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी संभालेंगे। यानी पंचायतों में विकास कार्य, योजनाओं का संचालन और प्रशासनिक जिम्मेदारियां पहले की तरह उन्हीं के पास बनी रहेंगी।

मुख्यमंत्री योगी ने दी मंजूरी

पंचायती राज विभाग ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का प्रस्ताव सरकार को भेजा था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। माना जा रहा है कि सोमवार शाम तक इस संबंध में आधिकारिक आदेश भी जारी कर दिया जाएगा। सरकार के इस फैसले को ग्रामीण प्रशासन में स्थिरता बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इससे गांवों में विकास कार्यों की गति प्रभावित नहीं होगी।

पहली बार प्रधान बनेंगे प्रशासक

उत्तर प्रदेश में यह पहली बार होगा जब ग्राम प्रधानों को चुनाव तक प्रशासक की जिम्मेदारी दी जाएगी। अभी तक परंपरा यह रही है कि ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद एडीओ पंचायत को प्रशासक नियुक्त किया जाता था।

लेकिन इस बार सरकार ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों की तर्ज पर नया मॉडल अपनाने का फैसला किया है। इसके तहत गांवों की जिम्मेदारी उन्हीं प्रधानों को सौंपी जाएगी जो पहले से पंचायतों का संचालन कर रहे हैं। सरकार का मानना है कि इससे गांवों में योजनाओं और विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी।

पंचायत चुनाव में होगी देरी

प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर लंबे समय से अटकलें लगाई जा रही थीं। अब लगभग साफ हो गया है कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव 2027 के बाद ही कराए जाएंगे। सूत्रों के मुताबिक पंचायत चुनाव में देरी की कई वजहें हैं। इनमें हाईकोर्ट में चल रही प्रक्रियाएं, आयोग की रिपोर्ट और मतदाता सूची का कार्य प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए मतदाता सूची अभी पूरी तरह तैयार नहीं हो पाई है। जानकारी के अनुसार अंतिम मतदाता सूची 10 जून को जारी की जाएगी।

करीब एक साल बढ़ सकती है अवधि

सरकारी सूत्रों के मुताबिक पंचायत चुनाव में करीब एक वर्ष तक की देरी हो सकती है। ऐसे में गांवों में प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासक नियुक्त करना जरूरी माना गया। यदि पंचायतों में कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जाती तो विकास कार्य पूरी तरह प्रभावित हो सकते थे। इसी वजह से सरकार ने मौजूदा प्रधानों को ही प्रशासक बनाने का रास्ता चुना।

ग्राम प्रधानों में खुशी का माहौल

सरकार के इस फैसले के बाद ग्राम प्रधानों में खुशी का माहौल है। राष्ट्रीय पंचायती राज ग्राम प्रधान संघ लंबे समय से सरकार से यही मांग कर रहा था कि चुनाव तक वर्तमान प्रधानों को ही जिम्मेदारी दी जाए।

संघ का कहना था कि गांवों की समस्याओं और विकास योजनाओं की जानकारी वर्तमान प्रधानों को बेहतर तरीके से है। ऐसे में यदि किसी बाहरी अधिकारी को जिम्मेदारी दी जाती तो विकास कार्य प्रभावित हो सकते थे। सरकार के फैसले के बाद ग्राम प्रधान संगठनों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार जताया है।

विकास कार्यों पर नहीं पड़ेगा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से गांवों में चल रहे विकास कार्यों पर असर नहीं पड़ेगा। सड़क, नाली, पेयजल, आवास और अन्य सरकारी योजनाओं का संचालन लगातार जारी रहेगा। यदि पंचायतों की जिम्मेदारी अचानक किसी अन्य अधिकारी को दी जाती तो योजनाओं के संचालन में बाधा आ सकती थी। मौजूदा प्रधानों के पास जिम्मेदारी बने रहने से प्रशासनिक प्रक्रिया सुचारू रहने की उम्मीद है।

ग्रामीण राजनीति में बढ़ेगी सक्रियता

इस फैसले का असर ग्रामीण राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है। पंचायत चुनाव भले ही टल गए हों, लेकिन गांवों में राजनीतिक गतिविधियां जारी रहेंगी। प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के बाद उनका प्रभाव गांवों में बना रहेगा। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव और भविष्य के पंचायत चुनावों को लेकर भी राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले प्रधान आने वाले समय में भी अहम भूमिका निभाएंगे।

विपक्ष भी रख सकता है नजर

सरकार के इस फैसले पर विपक्ष की नजर भी बनी हुई है। कुछ राजनीतिक दल इसे प्रशासनिक मजबूरी मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक रणनीति के रूप में देख सकते हैं।हालांकि सरकार का कहना है कि यह फैसला केवल ग्रामीण विकास और प्रशासनिक निरंतरता को ध्यान में रखकर लिया गया है।

गांवों में बनी रहेगी प्रशासनिक स्थिरता

प्रदेश की बड़ी आबादी गांवों में रहती है और पंचायतें ग्रामीण प्रशासन की सबसे अहम इकाई मानी जाती हैं। ऐसे में पंचायतों में प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता है। माना जा रहा है कि प्रशासक व्यवस्था लागू होने के बाद गांवों में सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन पहले कीतरह जारी रहेगा और विकास कार्यों में कोई बड़ी बाधा नहीं आएगी।
पंचायत चुनाव को लेकर बढ़ी उत्सुकता

हालांकि पंचायत चुनाव फिलहाल टलते नजर आ रहे हैं, लेकिन गांवों में राजनीतिक हलचल लगातार बनी हुई है। लोग अब इस बात पर नजर लगाए हुए हैं कि आखिर पंचायत चुनाव कब होंगे और सरकार आगे क्या रणनीति अपनाएगी। फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि 2027 विधानसभा चुनाव तक मौजूदा प्रधान ही ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी संभालते रहेंगे। सरकार का यह फैसला प्रशासनिक व्यवस्था, ग्रामीण विकास और पंचायत राजनीति-तीनों स्तरों पर बड़ा असर डालने वाला माना जा रहा है।

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