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गांधी युग के सफल शब्द शिल्पी पंडित सोहनलाल द्विवेदी-लेखक — शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी भाग 1 कल आप पढ़ चुके होंगे।

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                भाग-2
    स्वभावत: स्वच्छंद वृत्ति वाले होने पर भी उनमें सनातन धर्म के प्रति पूर्ण निष्ठा थी ‌‌।संबंधियों के साथ व्यवहार एवं शिष्टाचार की प्रथाओं का सोल्लास पालन करना तथा साहित्यिकों एवं देशभक्तों के साथ ही साथ श्रेष्ठ संतों का सत्संग भी उन्हें रुचिकर था ।उन्हें मनुष्य और मनुष्यता पर पूरा विश्वास था। न उन्हें अपने आप पर ही किसी प्रकार का संदेह था ,न किसी दूसरे पर ही वे संदेह करना ठीक समझते थे। प्रातः और  सायं  टहलने जाते और लौटते -लौटते ढाई तीन घंटे लगना अवश्यंभावी था। जहां रहते थे ,चलते वक्त उस कमरे की बाहरी जंजीर भर बंद कर देते। नीचे जीने का दरवाजा, ऊपर पूरा का पूरा बैठका तथा उससे लगा दूसरा कमरा भी खुला रहता ‌। न कहीं ताला, न चाबी । एक दिन पूछा- आप कहीं ताला नहीं लगाते ,तो बोले एक व्यक्ति को गाय दे रखी है ।वह उसका दूध लेकर सुबह ,शाम आया करता है और कमरे के भीतर रख जाता है । इस युग में ऐसा विश्वास शायद ही कहीं और कभी फिर देखने को मिले । उनकी उदारता भी गजब की थी। सन् 1982 की बात है ।दिल्ली जाने लगे तो शशि, पूनम और राजेश (तीनों श्री राम गोपाल जी की संतानें )जिद करने लगे -“बाबा जी आप दिल्ली जा रहे हैं हमें कुछ दीजिए।” उनका बिंदकी के इलाहाबाद बैंक की शाखा में खाता था। अटैची खोली ,चेक बुक निकाली, पहले एक चेक में, फिर दूसरी,  फिर तीसरी चेक में हस्ताक्षर किए और तीनों को ही एक-एक पकड़ा कर बोले “जितने भी रकम भरना हो भर लेना ।” और चल दिए ।
   महादेवी जी ने एक स्थान पर लिखा है- महान साहित्यकार अपनी कृति में इस प्रकार व्याप्त रहता है कि उसे कृति से पृथक कर देखना और उसके व्यक्तिगत जीवन की सब रेखाएं जोड़ लेना कष्ट साध्य ही होता है। ठीक ही लिखा है ।जैसे उनके ग्रंथों को पढ़ने पर उनके व्यक्तित्व की एक-एक रेखा उभर कर आने लगती वैसे ही उनके सान्निध्य से उनका संपूर्ण साहित्य उनके व्यक्तित्व में उजागर होने लगता था । प्रतीत होता सामने ही कुणाल के कुणाल ,वासवदत्ता के गौतम, विषपान के शिव तथा संजीवनी के कच ,युगावतार गांधी के गांधी जी  बैठे हुए हैं। उनके दर्शन मात्र से ही इतनी तृप्ति हो जाती कि कुछ बोलने -पूछने का मन ही न करता। सन् 1981 से सन् 1988 का कालखंड मेरी साधना का स्वर्णकाल  ही नहीं, मेरी सिद्धि का  भी स्वर्ण काल है। इसी अवधि में मैंने उनका जीभर वात्सल्य पाया तो काव्य की शैली भी उन्हीं के आशीष आशीर्वाद से पुष्ट हुई। उन्हें अत्यंत समीप से इसी कालावधि में मुझे जानने -समझने का सुयोग भी मिला ।
  विभिन्न पुरस्कारों पर उनकी निष्पृह दृष्टि का एक उल्लेख निरंकार देव सेवक ने बखूबी किया है। वे लिखते हैं- उनकी भैरवी और वासवदत्ता दोनों पुस्तकें हिंदी में उस समय के सर्वोच्च ‘देव’ पुरस्कार के लिए प्रकाशक द्वारा भेजी गई थीं और तनिक भी प्रयत्न करने से वह उन्हें प्राप्त हो सकता था। पर उन्होंने तो स्वयं उसी वर्ष स्वर्गीय श्री माखनलाल चतुर्वेदी की पुस्तक हिमकिरीटिनी उस पुरस्कार के लिए भिजवाई थी। अपना सर्वथा आत्मीय जानकर उन्होंने मुझे लिखा था- ‘देव’ पुरस्कार चतुर्वेदी जी को मिला। तुम्हें कदाचित मालूम हो कि मैंने ही उनकी रचनाएं छपवाईं ।नामकरण किया तथा देव पुरस्कार में भिजवाईं। यों शर्मा जी (पुस्तक प्रकाशक स्वर्गीय शालिग्राम शर्मा )भेजते ही न थे। 448 हिमकिरीटिनी को ,445  वासवदत्ता को, 442 अंक भैरवी को मिले ।जरा सी कन्वेसिंग से मेरा नाम आ सकता था। पर वैसा करना मैंने उचित नहीं माना। जो निर्णय हुआ है उससे तुम्हें संतोष हुआ होगा।
   एक राष्ट्रीय कवि होने के नाते विभिन्न स्थानों में होने वाले  कविसम्मेलनों एवं समारोहों में उन्हें जाना अनिवार्य सा था। लेकिन वास्तव में उन्हें भीड़भाड़, धूम धड़ाका पसंद नहीं थे‌। वह अत्यंत सरल एवं कोमल प्रकृति के व्यक्ति थे ‌। सन् 1943 में ही एक पत्र में उन्होंने निरंकार देव सेवक को लिखा था – न जाने मुझे कवि सम्मेलनों में जाने से क्यों चिढ़ होती है। इससे जी उकता सा गया है। कुछ ठोस चीज लिखने की, पढ़ने की इच्छा जागृत हो उठी है ।
उनके राष्ट्रकवि होने के संबंध में ठाकुर श्री नाथ सिंह ने एक स्थान पर लिखा है – उन दिनों चोटी के कवि जैसे स्वर्गीय बाबू मैथिली शरण गुप्त और पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय आदि कविसम्राट कहे जाते थे। परंतु जब भारत में राष्ट्रीय चेतना की लहर दौड़ी। तब इन कवियों ने इस पदवी में गौरव की हानि समझी और वे अपने लिए महाकवि आदि नए-नए विशेषण खोजने लगे । तभी किसी विराट कवि सम्मेलन में कवियों का परिचय देने वाले वक्ता ने पंडित सोहनलाल द्विवेदी को राष्ट्रकवि कहकर संबोधित किया । राष्ट्रीय कविताएं बहुतेरे कवियों ने लिखी हैं और हो सकता है उन्होंने श्री सोहनलाल जी से अच्छी भी लिखी हों पर राष्ट्रकवि के रूप में एकमात्र वे ही समादृत हैं ।
श्री युत हरिवंश राय बच्चन जी ने भी कुछ ऐसा ही लिखा है – जहां तक मेरी स्मृति है, जिस कवि को राष्ट्रकवि नाम से सर्वप्रथम अभिहित किया गया वे सोहनलाल द्विवेदी थे ।बाद में प्रचार युग उन्हें पीछे छोड़कर दूसरे -दूसरे राष्ट्रकवि खड़ा करता रहा । फिर भी हिंदी में राष्ट्रीय धारा की कविता की जब चर्चा होगी तो उन्हें सर्वप्रथम स्मरण किया जाएगा।
  उनकी काव्य साधना द्विवेदी युगीन परिवेश में गांधीवादी आदर्शों से प्रेरित हो आरंभ हुई और अंत तक भारतीय संस्कृति के उदात्त जीवन मूल्यों का संयोजन एवं संवर्धन करती हुई सतत गतिमान रही। उनकी कविता का मूल स्वर राष्ट्रीय चेतना और देशप्रेम ही रहा। उन्होंने यदि गांधी, नेहरू ,सुभाष, पटेल ,चंद्रशेखर आजाद, मालवीय जी की भूरिभूरि प्रशंसा की तो भ्रष्ट नेताओं को – “पीछे झंडा फहराना ओ झंडे वालो, पहले जवाब दो मेरे चंद सवालों का। ” कहकर ललकारा भी ।जिस कवि ने आजादी के पहले “सुना रहा हूं तुम्हें भैरवी, जागो मेरे सोने वाले!”  कहकर सोई जनता को जगाने का प्रयास किया था‌ ।उसने आजादी के बाद भी “अब न गहरी नींद में तुम सो सकोगे, गीत गाकर मैं जगाने आ रहा हूं।”  गाकर जागरण का संदेश दिया। अहिंसक गांधीवाद से प्रारंभ होने वाली वह यात्रा जो-” न हाथ एक शस्त्र हो ।
न साथ एक अस्त्र हो।
न अन्न ,नीर ,वस्त्र हो।।
हटो नहीं, डटो वहीं,
बढ़े चलो, बढ़े चलो।”
से बढ़ी थी। देश के खतरे को भांपकर – “तलवारों की ही धारों से ,सिंहासन चमक करता है।
तलवारों की अनुहारों से सिंहासन दमका करता है ।।
करुणा न कहीं बन जाय हार, जागते रहो , हो खबरदार।
हो कहीं देश पर यदि प्रहार,
लो आक्रांता का शिर उतार।। हिमगिरि की चोटी से पुकार, कहता हूं तुमको बार-बार।   
मेरे भारत के कर्णधार, जागते रहो, हो खबरदार।।”
के मुकाम तक पहुंची ।उन्हें देश से बढ़कर कुछ नहीं था। ‌राष्ट्र की अस्मिता से समझौता कतई बर्दाश्त न था । ऐसे राष्ट्रीयता के सबल स्वर – संधाता राष्ट्रकवि को कृतज्ञ राष्ट्र का शत-शत नमन !

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