अगहन शुक्ल पक्ष एकादशी इस बार 1 दिसंबर 2025 को पड़ रही है । यह वही तिथि है , जब यादवेंद्र भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के बीच अर्जुन के मन में असमय वैराग्य उत्पन्न हो जाने पर वह अमर उपदेश दिया जिससे वे युद्ध के लिए अग्रसर हो सके ।
जिस प्रकार से श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण सूर्यवंश की परिचय गाथा है ,वैसे ही महाभारत चंद्रवंश की । इसका प्राचीन नाम ‘जय’ और ‘भारत’ है । हर्षवर्धन के काल में इसका उल्लेख पंच साहस्री संहिता के रूप में आया है लेकिन अब यह शत साहस्री संहिता है।
भार्गव सोमाहुति की पूर्वज परंपरा में इसका निर्माण हुआ। इसमें गीता को बहुत बाद में महर्षि प्रचेता ने भीष्म पर्व में सम्मिलित किया और संपूर्ण ग्रंथ महर्षि व्यास के नाम से प्रसिद्ध किया गया । प्रख्यात लोकोक्ति है – “यन्न भारते, तन्न भारते।” अर्थात “जो महाभारत में नहीं है, वह भारत में नहीं है।”
महर्षि व्यास के नाम से प्राचीन काल में तीन व्यक्ति प्रसिद्ध हुए हैं- बद्रिकाश्रम निवासी महर्षि बादरायण व्यास, वेदों के विस्तारक एवं विभाजक महर्षि वेदव्यास तथा महाभारत और 18 पुराणों के रचयिता महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास।
इससे अधिक का अवकाश न होने से कुरुक्षेत्र में भगवान कृष्ण ने संक्षेप में दो या चार वाक्यों में शोकाकुल अर्जुन को युद्ध में सन्नद्ध होने का उपदेश दिया होगा। वर्तमान में18 अध्याय संयुक्त यह ग्रंथ संपूर्ण उपनिषदों का सार है।
“युक्ति – मुक्ति, अनुराग- त्याग, सब एक साथ सिखलाती।
अमर रहे गीता की वाणी , पुण्य पंथ दिखलाती।।”
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मार्गशीर्ष शुक्ला एकादशी – गीता जयंती लेखक : शैलेन्द्र कुमार द्विवेदी
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